*प्रेम — एक आत्मिक बंधन*
_शृंगार रस,
नयन से नयन मिले तो बात कौन बोले,
बिन कहे ही रूह ने रूह को टटोले।
तेरी हँसी की धूप में मेरा मन नहाए,
तेरे मौन में भी मुझे गीत सुनाई दे।
छू लिया जब हाथ तूने, कँप गई है साँस,
देहरी पे रख दिया तूने मन का विश्वास।
काजल-सी रातों में तेरी याद का दीप,
जलता रहा तिल-तिल मुझे करता रहा तृप्त।
चंदन-सी महकी तेरी साँसों की हवा,
अंग-अंग में घोल गई कोई नई दवा।
अधरों पर नाम तेरा, अर्चना-सा लगता,
हर धड़कन में बस तेरा ही सजदा करता।
रूप का बंधन नहीं, ये मन का मेल है,
जन्मों का कोई लेखा, कोई खेल है।
तू पास हो तो भीगा सावन लगता है,
तू दूर हो तो भी मन तुझमें बसता है।
ये देह की दूरी क्या, आत्मा तो पास है,
प्रेम हमारा कोई रीत-रिवाज़ नहीं, एहसास है।
मैं मीरा बन जाऊँ, तू मेरा घनश्याम,
आत्मा से आत्मा का हो जाए प्रणाम।।
सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार
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