मैं धरा हूँ
मैं धरा हूँ
स्वरा हूँ
अन्न जल से भरा हूँ
श्रद्धा- शीतलता लिए
पवन - गगन संग खड़ा हूँ!
भीषण तूफानों के वेग में भी
बड़े चट्टानों सा पड़ा हूँ
सप्तरंगी रंगों में मढ़ा हूँ
शोभा - सादगी से जड़ा हूँ।
अ ज्ञानियों के सर चढ़ा हूँ
ज्ञानियों में ज्ञान से भरा हूँ
मैं धरा हूँ।
रचनाकार - सुख मंगल सिंह
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