वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा: संस्मरण" -
यात्रा वृत्तांत के क्रम में अनेक साहित्यकारों ने समय समय पर यात्रा की। यात्रा होती है तो दो भौगोलिक स्थान के रह रहे लोग आपस में एक दूसरे की बोली- भाषा, संस्कृति- सभ्यता का आदान प्रदान किया जाता है। विविध बाहनों से यात्रा की जा सकती है। जैसे - विमान,बस,नाव,जलयान, और पैदल भी यात्रा होती है।
यात्रा वृत्तांत के क्रम में अनेक साहित्यकारों ने समय समय पर यात्रा की। यात्रा होती है तो दो भौगोलिक स्थान के रह रहे लोग आपस में एक दूसरे की बोली- भाषा, संस्कृति- सभ्यता का आदान प्रदान किया जाता है। विविध वाहनों से यात्रा की जा सकती है। जैसे - विमान,बस,नाव,जलयान, और पैदल भी यात्रा होती है। जब यात्रा मुझे शुरू करनी थी मित्रों ने कहा की भाई चंडीगढ दूर की है आप अपनी उम्र 69 वर्ष की हो चुकी है और राजेंद्र प्रसाद गुप्त 'बावरा '
74 वर्ष के हो चुके ऐसे में आप लोगों को बहुत दूर की यात्रा करने से बचना चाहिए तो मैं एक रचना लिखी जो प्रस्तुत कर रहा हूं:
टूटे पंखों से उड़ान
पंख कतर दिए थे दुनिया ने,
कहा था - अब उड़ न पाओगे।
मैंने हँसकर आसमान देखा,
और हौसले को पंख बनाया।
जख्मों से रिसता लहू कहता था,
बैठ जाओ, बहुत हुआ।
पर मिट्टी की सौगंध थी मुझ पर,
गिरकर फिर उठना सीखा हुआ।
हवाएँ खिलाफ थीं, तूफान साथ था,
हर मोड़ पर दीवार खड़ी थी।
मैंने अपनी ही साँसों को पतवार बनाया,
और दर्द को अपनी नाव कर ली।
टूटे पंखों से उड़ान भरी है,
यह उड़ान गिरने से बड़ी है।
जमीन ने जब भी खींचा नीचे,
मैंने और ऊँचा सिर किया है।।
यात्रा प्रायः विविध चरण में होती है। यात्रा में जगह-जगह ठहराव होता है। कुछ यात्रा एक दिशा में होती है। एक दिशा में होने वाली यात्रा की मूल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाना और वहां सम्पन्न होने वाले कार्यक्रम में भाग लेना होता है इसके बाद यात्रा जिस जगह से शुरू होती है वहीं आकर यात्रा स्थगित हो जाती है। यात्रा में अनुसंधान,मनोविनोद,तीर्थ दर्शन व विचारों का आदान-प्रदान होता है।
यात्रा वृत्तांत में शामिल बाहर से आने वाले लोगों की यात्रा जिन जिन स्थानों से आगे बढ़ती है उनका उल्लेख किया जाता है।उन लोगों के क्षेत्र से जुड़ी सभ्यता संस्कृति और संस्कार को यात्रा वृत्तांत में उकेरा जाता है। उपन्यास कहानी की तरह उसमें लिखने की सुभिधा अनुभव के बल पर नहीं होती बल्कि यह यात्रा केवल विहंगम दृष्टि वाली नहीं होती। सभी स्थल ,मानव संपर्क ,रास्ते,देशकाल आदि दृष्टि से संपन्न और अपने अनुभव ज्ञान वाली होती है।
यात्रा वृत्तांत की परम्परा भारतेन्दु से माना जाता है।कहां जाता है कि यात्रा वृत्तांत लिखने का सूत्रपात भारतेन्दु ने किया। भारतेन्दु की यात्रा वृत्तांत कवि वचन सुधा वचन में प्रकाशित हुआ करती थीं।
अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक ई पत्रिका का दिनांक 2 जुलाई 2023 का मेल जिसमें हमने पंजीकरण कर लिया था मन मस्तिष्क पर उसके बारे में चिंतन चल रहा था मन में आया कि भारत शांति का संदेश देने वाला देश है तो एक चार लाइन की रचना याद आई
शांति का संदेश लेकर चल दिया,
सद्भाव और प्रेम परोसते चल दिया।
संस्कृति संस्कारों में पल यह देश
बंधुत्व की कामना लिए चले दिया।।
ॐ शांति: शांति:
सरयू का पावन किनारा, सरयू में गोता लगाने की ललक, धर्मशास्त्र के अनुसार सरयू में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर की पाप नष्ट हो जाते हैं साथ ही मनुष्य को मुक्त भी मिलती है। सरजू से 3 किलोमीटर पहले स्थित अपने आदर्श गांव ग्राम महरौली रानी मऊ जाना था गांव में कुछ मकान का कार्य करना था तीन कमरों की दीवार प्लास्टर होनी थी। सब पत्नी उर्मिला सिंह के साथ मैं गांव पर पहुंच गया और पड़ोसी की मदद से मजदूर और मिस्त्री भी मिल गए काम शुरू हो गया। प्लास्टर का काम पूरा होने के बाद हमने अपने मित्र जो बालीपुर में रहते हैं उनके कुछ सामान को जैसे बेलचा, रसिया, लोहे की कढ़ाई, लोहे का सबल आदि को लेकर अपनी अल्टो गाड़ी से पहुंचने गया समान पहुंच कर जब वापस आ रहा था तभी ग्राम अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के दक्षिणी छोर पर हरिजन बस्ती के पास अपनी गाड़ी को रोकना पड़ा और बात होने लगी विभा चसवाल जी से आपने बताया कि 4,5,6अगस्त को अनहद कृति का साहित्याश्रय स्ट्रीट 2023 में बुलावा है। हम दोनों में लगभग आधा घंटा की बात में दो रचनाएं और भेजने के लिए उन्होंने कहा दूसरे दिन हमें बनारस जाना था इसलिए मैंने कहा कल रचना भेज दी जाएगी।
रात्रि में दूसरे दिन सुबह से तैयारियां जोरों शोरों से होने लगी|
सनातन धर्म मंदिर जो इंदिरा गांधी होलीडे होम के पास ही था दर्शन पूजन करने के उपरांत कैंटीन में आकर चाय पानी करके अपने रूम जो हालीडे होम में मिला था आकर आराम कर रहा था की हाल के सामने समोसा जलेबी और काफी का काउंटर लग चुका । बावरा मैं बोला कि चलिए सभा स्थल जो होलीडे होम में सजा हुआ था का नजारा लिया जाए। दोनों लोग साथ में हाल के पास पहुंचे काउंटर पर सजी हुई जलेबी समोसा और चाय पीने की इच्छा जाहिर हुई समय भी दिन में 12:00 बज चुके थे
समोसा को जैसे ही तोड़ा उसमें हरी मटर भिगोकर डाली गई थी बहुत आनंद आया खाने के बाद वह बहुत ही लाजवाब लगा। पहले जिलेबिया खाई फिर समोसे और अंत में काफी पी।
हाल में सभा स्थल पर लोग बैठना शुरू हो चुके थे हम दोनों लोग भी वहां जाकर उपस्थित हुए साहित्यकारों का परिचय होने लगा जगह से आए हुए साहित्यकार अपना नाम पता संपूर्ण विवरण के साथ बताते थे एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान होता था।
साहित्यकारों के परिचय का कार्यक्रम समाप्त हुआ बगल में ही भोजन का काउंटर सजा हुआ था वहां पहुंचने पर देखा की विविधतरह के व्यंजन काउंटर पर लगाए गए हैं जिसमें पापड़, छोले, पुरी, बेसन और मैदे की रोटी, चावल ,दाल, सलाद, रायता, मीठा और काफी स्टार लगा हुआ था।
यह कार्यक्रम ढाई दिनों तक चला जिस्म अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का भोजन परोसा जाता था कभी-कभी फल भी काउंटर पर लगा हुआ मिलता था मनभावन व्यंजन देखकर ऐसा लगता था कि मानो शादी का कोई बड़ा फंक्शन हो।
लोग छक कर भोजन खाते,
कार्यक्रम में खो जाते।
ऐसा कार्यक्रम फिर हो,
सब लोग मानते रहते।
चंडीगढ़ की पावन धरा पे,
चंडी का गुणगान सुनते।
अनहद कृति की शुभ बेला,
यादों को अपने घर ले जाते।।
भोजन के उपरांत दूसरी मीटिंग में शामिल रचनाकारों की रचनाएं पढ़ी जाती जिसे रचनाकार स्वयं अपनी भागीदारी सुनिश्चित किया करते थे। अपनी रचना वाईफाई लगे हुए अनहदकृत के पोर्टल पर पढ़ते थे।
अच्छी रचनाओं पर तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल में आनंदित हो जाता।
मैं! सुख मंगल सिंह ने अपनी रचना प्रस्तुत किया:-
कुछ शब्द हैं जो पन्नों पर कभी उतरे ही नहीं,
साँसों में घुले रहे, आँखों में ठहरे रहे।
उनका कोई शीर्षक नहीं, कोई लेखक का नाम नहीं,
बस धड़कन की स्याही से लिखी एक अप्रकाशित किताब।
वे कविताएँ हैं जो रात के तीसरे पहर जागती हैं,
छत पर रखे अधूरे चाँद से बातें करती हैं।
सुबह होते ही ओस बनकर सूख जाती हैं,
किसी संपादक की मेज़ तक पहुँच नहीं पातीं।
अप्रकाशित होना भी एक तरह का प्रकाश है,
जो सिर्फ कहने वाले और महसूस करने वाले के बीच ठहरता है।
हर छपी हुई इबारत के पीछे,
एक अप्रकाशित सच साँस लेता है।
क्या ज़रूरी है कि हर दर्द छपे, हर ख़ुशी बाँटी जाए?
कुछ रौशनी दीयों में ही खूबसूरत लगती है,
किताबों के कवर पर नहीं।
तुम्हारे भीतर भी होगी कोई ऐसी कविता,
जो आज तक अप्रकाशित है ,
पर सबसे ज़्यादा पढ़ी गई है।
सुबह सवेरा होता लोग नृत्य क्रिया से निवृत होकर एक-एक करके बाहर निकलते कि इस समय विभा चसवाल जी बाहर निकली और मैं भी बाहर निकाल बात चली चौपाल की कुर्सियां हम लोग रखने लगे लान में , कमरे के सामने चाय बिस्कुट रखा हुआ था । लोग बारी-बारी से बिस्कुट खाते चाय पीते । वहीं पर राजेंद्र गुप्त बावरा जो चंदौली जनपद से थे डेढ पैकेट नमकीन लाकर रख दिए नमकीन बड़ा चटपटा था लोगों को बहुत अच्छा लगा।
रचनाओं का दौरा फिर चला उपस्थित रचनाकारों की अध्यक्षता संपादक द्वय आदरणीय पुष्पराज चसवाल, डॉ प्रेमलता चसवाल 'पुष्प' ने की। संचालन का काम अमरीका से पधारी प्रवासी भारतीय मूल की डॉक्टर विभा चसवाल ने किया। इस कार्यक्रम के रिकॉर्डिंग भी की गई, साथ ही साथ यू एस ए से भारतीय मूल की- ललित बत्रा ने ड्रोन से भी फोटो ग्राफी की।
ग्राउंड पर सुख मंगल सिंह से रचना पढ़ने के लिए कहा गया:- तो उन्होंने एक और रचना प्रस्तुत की जो लोगों के दिलों को बहुत अच्छा लगा:-
" पुरखे जागे - तुम जागो"
कल तक पुरखे जाग रहे थे,
जागो अब, तुम जागो!
आंगन मेरा ही श्रृंगार,
विविध पुष्पों का बहार।
विदीर्ण न हो आनंद कानन,
जागो फिर तुम जागो!
आत्म निरीक्षण तुम करना,
धरा आलोकित रखना।
अनंत प्राकृतिक संपदा की,
रक्षा तुम्हीं को करना।
मन के दिन मणि प्रेम प्रकाश,
पांव बढ़ाओ जागो।
बाहें अंगणित बढ़ने वाली,
बढ़ो बढ़ छांटो पाश।
यदि हो आंगन आश,
रण में बिछा दो उनके लाश।
होगी नहीं पूरी अभिलाषा,
बजा दो उनके ताशा।
नहीं पता है उसकी लाश,
बांधे सपने रखी ख्वाब।
व्यग्र निगाहें उचक उचक कर,
ढूंढ रही सूनी राह।
जागो तुम फिर जागो,
कल तक पुरखे जाग रहे थे।।
दिन में सभा स्थल पर कार्यक्रम चला रहा संगीत प्रस्तुत हुई सरस्वती पूजा अर्चना,पुष्प अर्पित सरस्वती जी को। शाम 5:00 बजे टूर पर जाने का कार्यक्रम था लोग बस में सवार हुए और पहुंच गए सुकना झील पर। झील का सैर बहुत अच्छा था।
यात्रा की महत्व बताती हुई नोबेल पुरस्कार प्राप्त ब्राजील की कवित्री मार्था मेरिडोस एक रचना प्रस्तुत की -
रचना का शीर्षक रचना पढने से लगा, यात्रा क्यों आवश्यक है।
आप धीरे-धीरे करने लगते हैं, अगर आप:
करते नहीं कोई यात्रा !
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की दुनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ।।
आप धीरे-धीरे करने लगते हैं, जब आप:
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान!
नहीं करने देते मदद अपनी और
ना ही करते हैं दूसरों की।।
आप धीरे-धीरे करने लगते हैं, और अगर आप:
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के!
चलते हैं रोज उन्हीं रोजवाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग या
आप नहीं बात करते उनसे जो है अजनबी अनजान।।
आप धीरे-धीरे करने लगते हैं अगर आप:
नहीं बदल सकते हो अपनी जिंदगी को जब,
हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हो निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हो पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी
समझदार सलाह से दूर भाग जाने की--!
तब आप धीरे-धीरे करने लगते हैं --!!
(इसी रचना पर नोबेल पुरस्कार मिला)
यात्रा के दौरान आवश्यकता -
* काम हो जाने पर लौट आने की नियत।
*तीन जोड़ी कपड़े।
*मंजन, तोलिया, साबुन ,चंदन, पूजा की सामग्री।
*जाने और घर आने की तारीख।
*जिसके पास जाना है उसका नाम पूरा पता शहर का नाम मोबाइल नंबर शहर का पिन कोड आदि
*थोड़ा पैसा, आधार कार्ड, पैन कार्ड व डेबिट कार्ड।
*जहां जाना है उसे जगह की जानकारी शहर के किस हिस्से में है, जाना पहचाना लैंड मार्क, व्हाट्सएप पर लोकेशन व्यस्ट है,
*यात्रा की अनुमति पत्र (टिकट), कागज पर छपा हुआ, अथवा यस एम यस प्रारूप में!
यात्रा में क्या ना ले जाएं-
*अरे हो जाएगा वाली आस
*उसने बुलाया है तो जा रे वाली सोच!
*देख लेंगे वाला दृष्टिकोण!
* अकड़।
अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की साहित्याश्रय स्ट्रीट 2023, हेतु बुलावा 2 जुलाई 2023 को मेरे मेल sukhmangal@gmail.comपर आया मैं किताब की बात, पुस्तक प्रदर्शनी, Parivar ke sadasyon ke liye Hindi shabd yagya ka anutha avsar sahityashare, ek bar punsah dastak de raha hai.likha.
अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के इस कार्यक्रम को ढाई दिन के लिए विविध सांस्कृतिक साहित्यिक गतिविधियों और आगे बढ़कर मिलनवर्तन आपस में होगा। और दो दिन का पुस्तक प्रदर्शनी में आप कर पाएंगे अपने किताब की बात। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए साहित्य आश्रय 2023 में पंजीकरण कर कर अपने बारे में जानकारी देनी थी।
अपनी प्रतिक्रिया एवं प्रश्न काम के जीमेल पर भेजने को आदेशित हुआ था।
अनहदकृत पत्रिका का श्री गणेश 2013 में हुआ जिसमें हमने समय से ही सदस्यता ग्रहण कर ली थी सन 2023 तक इस ई पत्रिका में कुल 13 रचनाएं अब तक मेरी प्रकाशित हुई।
किसी बड़ी संस्था में प्रकाशित रचना को फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप इंस्टाग्राम ब्लॉक पर पोस्ट कर देते हैं हम तो उन रचनाओं को की कॉपी करके अखिल भारतीय सद्भावना संगठन, आलो पोयट्री, अभी पोस्ट कर देते हैं।
साहित्य काव्य संकलन पर मेरी 145 रचनाएं प्रकाशित है। शब्द इन, वेवली काम, हिंदी साहित्य शिल्पी आदि।
चंडीगढ़ की यात्रा करने के लिए उसे मेल में हमें यह रचना लिखने को मजबूर किया-
आपने पुकार दिया,
मेरे विचार को,
आपका आशीर्वाद हो
मेरी मनोबल को
शुभ आशीर्वाद देकर
चिंतन को
निखार दिया
मौका दिया मौका
लेकर विचार किया
सर्जन के सुख को
मोतियों में ढाल लिया।।
ट्राई के फैसले से फेसबुक के सीईओ जाकर वर्ग को जब निराशा हुई तो हमने वेब दुनिया पर लिखा की" जुकरबर्ग जी को अपने उद्देश्यों पर कायम रहकर कार्य रूप देने में धीरज पूर्वक कार्य करने होंगे।" धन्यवाद!:
शांति सद्भाव पर एक रचना प्रस्तुत -
वो रफ्तार के लम्हों में,
खता तक पहुंचे।
तुम गए चांद तलक,
हम खुदा तक पहुंचे।
- २-
तेरे दामन में जितने सितारे हैं
होंगे ए फलक
मुझको अपनी मां की
मैली ओढनी अच्छी लगी।
अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक ई पत्रिका का दिनांक 2 जुलाई 2023 का मेल जिसमें हमने पंजीकरण कर लिया था मन मस्तिष्क पर उसके बारे में चिंतन चल रहा था मन में आया कि भारत शांति का संदेश देने वाला देश है तो एक चार लाइन की रचना -
शांति का संदेश लेकर चल दिया
सद्भाव और प्रेम परोसते चल दिया।
संस्कृति संस्कारों में पल यह देश
बंधुत्व की कामना लिए चले दिया।।
ॐ शांति: शांति:
सरयू का पावन किनारा, सरयू में गोता लगाने की ललक, धर्मशास्त्र के अनुसार सरयू में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर की पाप नष्ट हो जाते हैं, साथ ही मनुष्य को मुक्त भी मिलती है। प्रस्तुुत है-
एक धार्मिक रचना : "सरयू की लहर बोले राम नाम"
सरयू की लहर बोले राम नाम,
तुलसी की डालियाँ झूमें आठों याम।
अयोध्या की माटी में बसत बसेरा,
रामराज का सपना आज भी घनेरा।
कण-कण में बसे हैं रघुवर की छाया,
हर कंकड़ पूछे "कहाँ गए सिया माया?"
धर्म की डोरी जब टूटन लागे,
मानव मन में तूफान जागे।
मंदिर-मस्जिद एक ही थाप बजावें,
घंटा और अजान मिलके गीत सुनावें।
जात-पात का भेद मिटे जब गंगा नहाए,
तब ही भारत का भाग्य जागे आए।
हे करुणा निधान, हे दीनदयाल,
अंधकार में जलाओ ज्ञान का मशाल।
जिस घर में राम का नाम न गूंजे,
समझो उस आंगन में दीपक न दूजे।
कर्म करो, फल की चिंता छोड़ दो,
गीता का सार मन में गाँठ बाँध लो।
सुख मंगल कहे सुनो रे प्राणी,
सेवा ही सबसे बड़ी पूजा बखानी।
राम नाम की माला फेरो मन के अंदर,
तब दिखे ईश्वर कण-कण के अंदर।
धरती माँ की गोद हरी हो जाए,
जब मानव-मानव एक-दूजे के काम आए।
जय श्री राम, जय सिया मैया,
भारत की माटी है सबसे बढ़िया।
सरजू से 3 किलोमीटर पहले स्थित अपने आदर्श गांव ग्राम महरौली रानी मऊ जाना था गांव में कुछ मकान का कार्य करना था तीन कमरों की दीवार प्लास्टर होनी थी। सब पत्नी उर्मिला सिंह के साथ मैं गांव पर पहुंच गया और पड़ोसी की मदद से मजदूर और मिस्त्री भी मिल गए काम शुरू हो गया। प्लास्टर का काम पूरा होने के बाद हमने अपने मित्र जो बालीपुर में रहते हैं उनके कुछ सामान को जैसे बेलचा, रसिया, लोहे की कढ़ाई, लोहे का सबल आदि को लेकर अपनी अल्टो गाड़ी से पहुंचने गया समान पहुंच कर जब वापस आ रहा था तभी ग्राम अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के दक्षिणी छोर पर हरिजन बस्ती के पास अपनी गाड़ी को रोकना पड़ा और बात होने लगी विभा चसवाल जी से आपने बताया कि 4,5,6अगस्त को अनहद कृति का साहित्याश्रय स्ट्रीट 2023 में बुलावा है। हम दोनों में लगभग आधा घंटा की बात में दो रचनाएं और भेजने के लिए उन्होंने कहा दूसरे दिन हमें बनारस जाना था इसलिए मैंने कहा कल रचना भेज दी जाएगी।
रात्रि में दूसरे दिन सुबह से तैयारियां जोरों शोरों से
होने लगी ।
- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
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