"यात्रा संस्मरण - काशी से गंगा के मायके तक""यात्रीगण": - वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं लेखक सुखमंगल सिंह जी (वाराणसी), कवि इंद्रजीत तिवारी 'निर्भीक', अधिवक्ता पवन कुमार सिंह जी, प्रवक्ता बी. डी. वर्मा जी, विजय कुमार गुप्ता जी।"स्थान - वाराणसी कैंट से हरिद्वार, हरिद्वार से ऋषिकेश, मनसा देवी से अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा।""दिनांक 29/8/2026 - सावन का पावन महीना"कंक्रीट के जंगल की भागम-भाग से कुछ दिन मुक्ति पाने हेतु हम पाँच मित्रों ने तय किया - चलो, जहाँ गंगा का मायका है, वहीं चलते हैं।"प्रस्थान - वाराणसी कैंट"रात 8:20 बजे वाराणसी कैंट स्टेशन से ट्रेन चली। सुखमंगल सिंह जी ने कहा - "काशी विश्व की नाभि है, और हरिद्वार उसकी सास। बेटी को ससुराल भेज कर मायका देखने जा रहे हैं।" सब हँस पड़े। कवि इंद्रजीत तिवारी निर्भीक जी ने तुरंत एक दोहा जड़ा -काशी से हरिद्वार तक, गंगा संगम साथ।चल रे मन अब देख ले, मैया का वो घाट।।पवन जी एडवोकेट अपनी वकालत वाली डायरी में भी यात्रा नोट कर रहे थे, बी. डी. वर्मा जी प्रवक्ता की तरह हर स्टेशन का इतिहास बता रहे थे, विजय गुप्ता जी सबके लिए चाय-पानी की व्यवस्था में।सुबह हरिद्वार पहुँचे।"हरिद्वार - हर की पौड़ी"हर की पौड़ी पर पहली बार गंगा को देखा तो लगा काशी की गंगा बड़ी होकर यहाँ बच्ची बन गई है - तेज, चंचल, निर्मल। स्नान किया। सुखमंगल जी बोले - "वाराणसी में गंगा मोक्ष देती है, यहाँ गंगा जन्म देती है।"वहीं से हम कुशा घाट, ब्रह्म कुंड, बिड़ला घाट घूमे। बाजार में कचौड़ी-जलेबी खाई।फिर रोप-वे से "मनसा देवी दर्शन"। ऊपर चढ़ते ही पूरा हरिद्वार आँखों के सामने - गंगा तीन धाराओं में बँटती हुई। मनसा देवी मंदिर में सबने मन्नत का धागा बाँधा। निर्भीक जी ने कहा - "माँ मनसा, सबकी मनसा पूरी करना, पर कवियों को अहंकार मत देना।""हरिद्वार से ऋषिकेश"ऑटो से ऋषिकेश, मात्र 24 किलोमीटर। रास्ते में राजाजी नेशनल पार्क - जंगल, हिरण, हाथियों के निशान। वर्मा जी बोले - "देखो, यही तो असली भारत है, जहाँ सड़क भी जंगल से परमिशन ले कर गुजरती है।"ऋषिकेश में - "राम झूला, लक्ष्मण झूला, त्रिवेणी घाट।" गंगा यहाँ और शांत, ध्यानमग्न। त्रिवेणी घाट की आरती देख कर आँख भर आई। हजारों दीये गंगा में बह रहे थे, जैसे काशी की देव दीपावली यहाँ रोज होती हो।गीता भवन, स्वर्ग आश्रम देखा। वहाँ विदेशी भी संस्कृत बोल रहे थे। पवन जी बोले - "कानून यहाँ फेल है, यहाँ तो सिर्फ आत्मा का कानून चलता है।""अंतिम पड़ाव - अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा (ऋषिकेश-देहरादून रोड)"शाम को हम अवधूत आश्रम पहुँचे। शंकर चौराहा के पास शांत, एकांत आश्रम। न कोई शोर, न कंक्रीट का रेला, बस गंगा की कल-कल और मंत्र ध्वनि। आश्रम के महात्मा जी ने हमें तुलसी की चाय पिलाई और कहा - "काशी में ज्ञान मिलता है, हरिद्वार में स्नान और ऋषिकेश में ध्यान।"सुखमंगल सिंह जी ने अपनी कविता सुनाई - "ब्रज की भोर"। पूरा आश्रम तालियों से गूँज उठा।रात वहीं विश्राम, सुबह गंगा को प्रणाम कर हम वापस काशी की ओर चले, मन में एक ही भाव लिए -हरिद्वार में डुबकी, ऋषिकेश में ध्यान।मनसा माँ के दर पर, झुके सकल जहान।अवधूत आश्रम में मिला, जो काशी में न मिले।मंगल-सुख सब साथ चले, तो तीर्थ स्वयं खिले।।यात्रा समाप्त, पर गंगा साथ चल रही है।"यात्रा संस्मरण का द्वितीय भाग - 31 अगस्त 2026, हरिद्वार"______________________________________ "पाँच यात्री - वही -" वरिष्ठ साहित्यकार सुखमंगल सिंह जी, कवि इंद्रजीत तिवारी 'निर्भीक', अधिवक्ता पवन कुमार सिंह, प्रवक्ता बी. डी. वर्मा जी, विजय कुमार गुप्ता जी।सुबह हरिद्वार की भोर। हम सब अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा से टेंपो पकड़ कर हरिद्वार के लिए निकले। आज का दिन ज्ञान और वैराग्य के नाम था।"पहला पड़ाव: - गीता भवन"हर की पौड़ी के पास ही विशाल गीता भवन। दीवारों पर पूरी गीता चित्रों के साथ लिखी है। अंदर सैकड़ों कमरे, हजारों यात्री, पर शोर कहीं नहीं - बस शांति। सुखमंगल सिंह जी बोले - "काशी में शास्त्रार्थ होता है, यहाँ शास्त्र दीवारों पर चुपचाप पढ़ाता है।"हमने वहाँ भगवान कृष्ण-अर्जुन की झाँकी का दर्शन किया। बी. डी. वर्मा जी हर श्लोक का अर्थ बच्चों की तरह समझा रहे थे। गीता भवन की विशेष बात - यहाँ सबको *भंडारे का प्रसाद* मिलता है। दाल, रोटी, सब्जी, खीर। पंक्तियों में बैठ कर पाँचों मित्रों ने प्रसाद पाया। पवन जी बोले - "अदालत में इंसाफ के लिए धक्के खाते हैं, यहाँ बिना माँगे प्रसाद मिलता है, यही तो भगवान की अदालत है।""दूसरा पड़ाव: - भारत माता मंदिर"यह मंदिर सप्ततल का है। अनोखा मंदिर जहाँ देवी-देवता नहीं, भारत माता है।पहले तल पर भारत माता, दूसरे पर शूर मंदिर, तीसरे पर मातृ मंदिर, चौथे पर संत मंदिर, पाँचवें पर शक्ति - हर तल पर भारत का इतिहास, शूरवीर, स्वतंत्रता सेनानी। ऊपर से हरिद्वार का विहंगम दृश्य। विजय गुप्ता जी भावुक हो गए, बोले - "तीर्थ तो बहुत देखे, पर अपने देश का तीर्थ पहली बार देखा।""अन्य मंदिर - माया देवी, दक्ष महादेव, पावन धाम, वैष्णो देवी धाम"इसी क्रम में हम माया देवी शक्तिपीठ, मैं दर्शन पूजन किया वहां गुफा में चलकर माता का हलवा का प्रसाद प्राप्त किया सभी पांचो यात्री उसे हवा को लेकर अपने रुकने वाले स्थान पर आकर हवा को जरा जरा सा चखा और अपने परिवार के लिए शेष हलवा लेकर जाने के लिए अपने बैग में रखा। कनखल में दक्ष महादेव मंदिर और काँच के चमकते पावन धाम के दर्शन करते हुए बाजार से निकले।गीता भवन के आगे जब हम लोग चले तो वहां बाजार में बहुत अच्छे-अच्छे कपड़े रंग-बिरंगे लगे हुए थे और बाजार में तो वैराग्य टूट ही गया। सबको अपने घर की याद आई।कवि निर्भीक जी ने अपने पोती के लिए छोटी सी धोती-कुर्ता ली, और अपने लिए दो कुर्ता लिया कुर्ता लिया ,पवन जी ने बेटी के लिए चुन्नी, अपने लिए एक कुर्ता लिया, वर्मा जी ने पौत्री के लिए फ्रॉक, गुप्ता जी ने पूरे परिवार के लिए हरिद्वार की प्रसिद्ध रुद्राक्ष माला और सुखमंगल जी ने अपने पौत्रों के लिए 'राधे-राधे' लिखी टी-शर्ट, दो धोती और दो कुर्ता लिया अपने लिए और अपने बेटे के लिए एक-एक कुर्ता और एक-एक पजामा लिया। सुखमंगल सिंह ने अपने लिए एक टोपी भी ली।दुकानदार हँसा - "बाबू जी, ज्ञान ले कर वैराग्य लेने आए थे, मोह ले कर जा रहे हो।"सुखमंगल जी बोले - "यही तो ज्ञान है, वैराग्य अपने लिए और मोह अपनों के लिए।"शाम ढले हम टेंपो से फिर "अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा" लौट आए। टेंपो में गंगा की हवा, हाथ में प्रसाद के थैले और बच्चों के कपड़े।रात्रि में आश्रम के आँगन में सुखमंगल सिंह जी ने उस दिन की अनुभूति पर अपनी एक बेहतरीन रचना सुनाई, जिसे सुन कर सबकी आँखें नम हो गईं -रचना :- "ज्ञान और वैराग्य का संगम"रचनाकार: - सुखमंगल सिंह 'मंगल' वाराणसी वासी अवध निवासी अम्बेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश।गीता भवन में गीता बोली, माटी बोली भारत माता।एक में कृष्ण का ज्ञान लिखा, दूजे में भारत का नाता।।भंडारे की एक पंगत में, राजा-रंक सब एक समान।भारत माता के आँगन में, झुका हुआ है सारा जहान।।कपड़े लाये नाती-पोतों के, प्रसाद बंधा है रूमाल में।मोह भी है, वैराग्य भी है, दोनों बंधे हैं इस थाल में।।कंक्रीट के जंगल से निकले, तो सच का दर्शन पाया।काशी के हम पाँच मुसाफिर, हरिद्वार में घर पाया।।सबने तालियाँ बजाईं। इंद्रजीत तिवारी निर्भीक जी बोले - "मंगल भैया, आज आपने यात्रा को ग्रंथ बना दिया।"इसी स्मृति के साथ उस रात शंकर चौराहा के पास अवधूत आश्रम में हम सो गए, सपनों में "भारत माता और गीता" दोनों साथ थीं।।- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी अवध निवासी अम्बेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश।
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