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Dr. Srimati Tara Singh
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विजय पर्व

 
विजय पर्व - शब्दों में राम, भावों में विजय
विजय पर्व

शब्दों में राम हैं, भावों में विजय है,
हर दिल में आज, फिर एक नया निश्चय है।

रावण केवल लंका में नहीं, मन में भी बसता है,
काम, क्रोध, अहंकार का रूप बनकर हँसता है।

राम ने तीर से नहीं, मर्यादा से जीता था,
सत्य के खातिर तो, राज-पाट भी छोड़ा था।

आज दशहरा है, पुतला जलाना आसान है,
अपने भीतर के रावण को जलाना, असली विजय गान है।

हर बुराई पर अच्छाई की जीत का नाम दशहरा है,
असत्य पर सत्य की जीत का पैगाम दशहरा है।

आओ आज हम भी, एक प्रण नया ले लें,
राम को शब्दों में नहीं, कर्मों में जी लें।

यही तो है विजय पर्व का सच्चा संदेश,
धर्म रहे, सत्य रहे, मिटे अधर्म का परिवेश।

बुराई पर अच्छाई की, असत्य पर सत्य की।
और अधर्म पर धर्म की विजय के पर्व विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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रचनाकार :- सुख मंगल सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार


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