यूक्रेन - रूस युद्ध : विश्व शांति के लिए एक गंभीर खतरा"
एक विस्तृत विश्लेषण
रूस-यूक्रेन युद्ध 24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ था और सितंबर 2026 तक अपने साढ़े चार साल पूरे कर चुका है। यह अब केवल दो देशों का सीमित संघर्ष नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा वैश्विक संकट बन गया है जिसका असर हर महाद्वीप पर पड़ रहा है।
1. युद्ध की पृष्ठभूमि क्या है?
इस युद्ध की दो अलग-अलग व्याख्याएँ हैं।
रूस का तर्क है कि नाटो का लगातार पूर्व की ओर विस्तार उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है, जैसे 1962 में क्यूबा संकट अमेरिका के लिए था।
वहीं यूक्रेन और पश्चिमी देशों का तर्क है कि किसी भी संप्रभु देश पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध है, और यूक्रेन को अपना भविष्य चुनने का अधिकार है।
इसी अविश्वास के कारण शांति वार्ता बार-बार विफल हो रही है।
2. विश्व के लिए यह युद्ध खतरा क्यों है?
अ. परमाणु युद्ध का खतरा
रूस दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्ति है। युद्ध के दौरान कई बार परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। यूक्रेन के ज़ापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र के आसपास हुई गोलाबारी ने पूरी दुनिया को चेर्नोबिल जैसी दुर्घटना की याद दिला दी।
ब. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चोट
अनुमान के मुताबिक इस युद्ध से अब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग $2.4 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो चुका है।
- ऊर्जा संकट:
रूस दुनिया का बड़ा तेल और गैस निर्यातक है। रिफाइनरियों पर हमलों से डीजल की अंतरराष्ट्रीय कमी और कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है।
भारत पर असर:
भारत ने रूस से 40% सस्ता तेल खरीद कर अरबों डॉलर बचाए, लेकिन उर्वरक और खाद्य तेल 50% तक महंगे हो गए।
स. खाद्य सुरक्षा का संकट
रूस और यूक्रेन दोनों दुनिया के सबसे बड़े गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल के निर्यातक हैं। काला सागर युद्ध का आर्थिक मोर्चा बन गया है। ब्लैक सी ग्रेन डील टूटने और बंदरगाहों पर हमलों से अफ्रीका और एशिया के गरीब देशों में खाद्यान्न संकट गहराया है।
द. मानवीय और पर्यावरणीय विनाश
फरवरी 2026 तक लगभग 6 लाख लोग हताहत हो चुके हैं, जिसमें लाखों सैनिक और 10,000 से अधिक नागरिक शामिल हैं। हर महीने लगभग 25,000 लोगों की मौत की खबरें आ रही हैं।
यूएन के अनुसार यूक्रेन के पुनर्निर्माण के लिए अगले 10 साल में 588 अरब डॉलर की जरूरत है, जो उसके GDP का तीन गुना है।
यूक्रेन आज दुनिया में सबसे अधिक बारूदी सुरंगों वाला देश बन गया है। काखोव्का बांध के विनाश, तेल रिसाव और रासायनिक प्रदूषण का असर पीढ़ियों तक रहेगा।
य. तीसरे विश्व युद्ध और गुटबाजी का खतरा
यह युद्ध दुनिया को फिर से दो गुटों में बाँट रहा है - एक तरफ अमेरिका-नाटो-यूरोप, दूसरी तरफ रूस। 2026 के लिए तीन परिदृश्य बताए जा रहे हैं - युद्धविराम (35-40%), गतिरोध जारी रहना (45-50%) और नाटो की सीधी भागीदारी से वैश्विक संकट (10-15%)।
3. निष्कर्ष - रास्ता क्या है?
सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यह युद्ध न तो पूरी तरह रणनीतिक मजबूरी है, न पूरी तरह अहम की लड़ाई, बल्कि दोनों का जहरीला मिश्रण है।
विश्व के लिए खतरा इस बात में है कि इसमें कोई भी पक्ष पूरी तरह जीत नहीं सकता, पर हार पूरी मानवता की हो रही है। भारत सहित कई देशों ने सही कहा है - "यह युग युद्ध का नहीं, कूटनीति का है।"
स्थायी समाधान तभी निकलेगा जब -
1. तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम हो,
2. खाद्य और ऊर्जा के लिए काला सागर जैसे मानवीय कॉरिडोर को युद्ध से अलग रखा जाए,
3. और सभी पक्ष सुरक्षा गारंटी के साथ बातचीत की मेज पर लौटें।
डॉ सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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