Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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ताप बढा सूरज का

 
ताप बढा सूरज का
 

ताप बढा सूरज का देखो, व्याकुल है जग सारा,  
धरती तपती तवे-सी, सूखा हर जल-धारा।  
पंछी बैठे मौन डाल पर, पंख समेटे हारे,  
राहों पर सन्नाटा छाया, पग भी लगते भारे।  

खेतों में दरारें उभरीं, मानो धरती रोई,  
किसान की आँखों में चिंता, उम्मीद कहीं खोई।  
नल सूखे, कुएँ भी प्यासी, मटके खाली पड़े,  
बचपन की वो नहर कहाँ अब, जिसमें हम थे कूदे।  

दुपहरी ऐसी आग उगलती, साया भी डर जाए,  
मज़दूर का पसीना माथे से रुक-रुक कर गिर जाए।  
शहरों में एसी की ठंडक, गाँव तड़पता जाए,  
एक ही सूरज पर देखो, कैसा भेद बनाए।  

पर पीपल की छाँव तले जब बैठो पल-दो-पल,  
पत्तों की सरसराहट देती ठंडी हवा का बल।  
याद दिलाए तपन के पीछे सावन भी आता है,  
हर तपती दोपहरी के बाद इक शाम सुहाता है।  

सूरज का ये ताप नहीं बस आग का गोला है,  
ये समय की भट्ठी है जो हमें तोला है।  
जो सह ले तपन को हँसकर, धीरज साथ निभाए,  
वही तपकर कुंदन बनता, जग में नाम कमाए।।

- सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
वाराणसी 

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