सुखमंगल की पांडुलिपि से
दिनांक - 19/1/2018 की डायरी से
हृदय के भावों से, इनका मिठास भर दो,
जीवन के अनुभव से, सुखद क्षण कर दो।
शब्दों के श्रृंगार से, अभिनव फिर दो,
विरही हूँ आँचल में, मंगल शब्द भर दो।
टूटे हुए मन को, फिर से सजा दो,
बिछुड़े हुए सपनों को, फिर से मिला दो।
अँधेरों की रात में, दीप जला दो,
मुरझाई कली को, फिर से खिला दो।
तुम्हारी लेखनी में, जो जादू भरा है,
उससे ही जीवन का, हर दर्द हरा है।
कलम से लिख दो, ऐसी एक कहानी,
जिसे पढ़कर मुस्काए, ये दुनिया दीवानी।
सुख मंगल कहे, यही अरदास मेरी,
कविता ही बन जाए, अब पहचान मेरी।।
रचनाकार - सुख मंगल सिंह
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