*श्रमिक दिवस का तोहफ़ा*
_एक लघु कहानी_
1 मई की सुबह थी। सरकारी स्कूल में श्रमिक दिवस पर प्रभात फेरी निकलनी थी। आठवीं का सुख मंगल सिंह झंडा थामे सबसे आगे था।
हेडमास्टर जी ने माइक सँभाला, “आज हम उस बच्चे का जन्मदिन मनाएँगे जिसने मज़दूर के बेटे होकर भी दुनिया में नाम किया। सुख मंगल, आगे आओ।”
सुख मंगल चौंका। “पर सर, मेरा जन्मदिन तो 26 जून है… सुबह 4:15 बजे का। माँ बताती है, उस दिन खेत में धान रोपते-रोपते दर्द उठा था।”
हेडमास्टर हँसे, “बेटा, जब तुम्हारा दाखिला हुआ था, तुम्हारे बाबूजी अंगूठा लगाकर 1 मई लिखवा गए थे। बोले, ‘मजदूर का बेटा है, मज़दूर दिवस पे पैदा मान लो, किस्मत जाग जाएगी।’ हमने भी सरकारी रजिस्टर में 1 मई चढ़ा दिया।”
क्लास में ठहाका लगा। सुख मंगल का चेहरा लाल हो गया। घर जाकर बाबूजी से लिपट गया, “आपने मेरी तारीख ही बदल दी?”
बाबूजी फावड़ा रखते हुए बोले, “बेटा, तारीख से क्या होता है? मैं ईंट ढोता हूँ, पर सपना ढोता हूँ कि तू पढ़कर बड़ी कुर्सी पर बैठे। 1 मई मज़दूर का दिन है। सोचा, इसी दिन नाम चढ़ेगा तो मेहनत का मोल समझेगा।”
सुख मंगल ने उस दिन ठान लिया। दिन में स्कूल, शाम को साइबर कैफे में पार्ट-टाइम। कोडिंग सीखी, रात-रात भर जागा। 26 जून की सुबह 4:15 बजे, जब दुनिया सो रही थी, उसने अपना पहला ऐप ‘किसान-साथी’ लॉन्च किया। तीन साल में वो ऐप गूगल प्ले पर करोड़ों किसानों का सहारा बन गया। गूगल ने उसे ‘इम्पैक्ट चैलेंज’ में बुलाया, अखबारों में छपा — “मज़दूर का बेटा, दुनिया के डिजिटल नक्शे पर।”
अगले श्रमिक दिवस पर वही स्कूल। हेडमास्टर जी ने फिर माइक थामा, “आज हम दो जन्मदिन मनाएँगे। एक 1 मई, जो रजिस्टर में है, और एक 26 जून, जो इस बच्चे ने खुद दुनिया के रजिस्टर में दर्ज कर दिया।”
सुख मंगल स्टेज पर आया। हाथ में फावड़ा और लैपटॉप दोनों थे। बोला, “बाबूजी ने तारीख बदली थी ताकि मैं श्रम का मतलब समझूँ। आज कह सकता हूँ — श्रम से ही सृजन होता है। चाहे खेत हो या की-बोर्ड, पसीना एक ही रंग का बहता है।”
तालियों की गड़गड़ाहट में 1 मई और 26 जून दोनों अमर हो गए। रजिस्टर की तारीख छोटी पड़ गई, हौसले की तारीख दुनिया ने याद रख ली।
*सीख:* जन्म की तारीख बदल सकती है, पर कर्म की तारीख इंसान खुद लिखता है। श्रमिक दिवस बस यही कहता है — हर हाथ जो बनाता है, वो पूज्य है।
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