''शब्द-शब्द में हिंदी, कण-कण में हिंदुस्तान"
शब्द-शब्द में हिंदी है, कण-कण में हिंदुस्तान है,
तभी तो इस मिट्टी पर, हमें इतना अभिमान है।
हिमालय की चोटी से जो हवा उतर कर आती है,
वो उर्दू नहीं, संस्कृत नहीं, हिंदी ही गुनगुनाती है।
गंगा के घाटों पर, जो दीया रोज जलता है,
उस लौ में भी "राम-राम" ही तो पलता है।
खेत में किसान जो हल चलाते हुए गाता है,
वो गीत अंग्रेजी नहीं, हिंदी में ही भाता है।
सीमा पर जवान जब "जय हिंद" चिल्लाता है,
तो कण-कण में बसा हिंदुस्तान जाग जाता है।
हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, ये माँ की थाप है,
हिंदुस्तान सिर्फ नक्शा नहीं, ये बाप का ताप है।
एक में ममता मिलती है, दूजे में मिलता मान है,
एक से मिलती वाणी है, दूजे से पहचान है।
जिस दिन शब्द से हिंदी निकली, उस दिन हम अनाथ हैं,
जिस दिन कण से हिंदुस्तान निकला, उस दिन हम समाप्त हैं।
इसलिए कहता हूँ, सुनो मेरे नौजवान साथी,
हिंदी को मत छोड़ो, यही है असली सारथी।
शब्द-शब्द में हिंदी रखो, कण-कण में हिंदुस्तान रखो,
दिल में भारत माता रखो, जुबां पर अभिमान रखो।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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