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''स्क्रीन के उस पार"

 

"शीर्षक: स्क्रीन के उस पार"
एक अप्रकाशित कहानी

राघव के पिता की चाय की दुकान रेलवे क्रॉसिंग के पास थी। पुरानी बेंच, काँच के गिलास, और दीवार पर टंगा एक कैलेंडर — यही उसकी दुनिया थी। राघव शहर से इंजीनियरिंग करके लौटा तो मोहल्ले में शोर मचा, "मास्टर का बेटा साहब बन गया।" पर लॉकडाउन में नौकरी चली गई। वह वापस उसी दुकान पर बैठने लगा, पर अब हाथ में चाय की केतली नहीं, मोबाइल था।

राघव ने यूट्यूब पर "Raghav Ki Chai" चैनल बनाया। पहले वीडियो में उसने पिता को चाय बनाते हुए दिखाया - अदरक कूटने की आवाज़, कुल्हड़ की खनक, भाप के बीच पिता की झुर्रियाँ। वीडियो रातों-रात वायरल हो गया। कमेंट आए, "Real India", "So aesthetic"। व्यूज़ बढ़े, पैसे आने लगे। 

तीन महीने में दुकान बदल गई। काँच के गिलास की जगह कुल्हड़, बेंच की जगह बेंत की कुर्सियाँ, कैलेंडर की जगह LED बोर्ड। पिता चुपचाप सब देखते। एक दिन बोले, "बेटा, ग्राहक अब चाय कम पीते हैं, वीडियो ज़्यादा बनाते हैं।"

राघव हँसा, "पापा, यही तो ब्रांडिंग है।" 

पर असली कहानी तब शुरू हुई जब बगल वाली बस्ती से रमेश काका आए। पुराने ग्राहक। बोले, "एक कटिंग देना, बेटा। पहले वाली। पचास पैसे वाली।" राघव ने मेन्यू दिखाया, "काका, अब सबसे सस्ती कुल्हड़ चाय 20 की है। स्पेशल है।" काका ने जेब टटोली, चुपचाप चले गए। कैमरा ऑन था। राघव ने वो क्लिप एडिट करके डाल दी — कैप्शन: "Inflation hits hard. Kaka couldn't afford chai." 

वीडियो पर 2 मिलियन व्यूज़। लोग रोए, "Heartbreaking." ब्रांड्स ने कॉल किया — "Collab करें? Poverty sells." राघव को लगा जीत गया। 

उस रात पिता ने दुकान की चाबी मेज़ पर रख दी। बोले, "कल से मैं सामने नाले के पास टीन शेड में बैठूँगा। पचास पैसे वाली चाय बेचूँगा। तू यहाँ अपनी शूटिंग कर।" राघव भड़क गया, "ड्रामा मत करो पापा। मैं आपको बड़ा कर रहा हूँ।" 

पिता धीरे से बोले, "बेटा, तूने चाय बेचनी नहीं सीखी, चाय बेचते हुए हमें बेचना सीख लिया। रमेश काका भूखा गया, और तुझे लाइक मिल गए। ये कैसी तरक्की है जहाँ गरीबी कंटेंट है और मदद कैप्शन?"

राघव को जवाब नहीं सूझा। अगली सुबह उसने देखा — पिता सचमुच टीन शेड के नीचे स्टोव लगाकर बैठे थे। बोर्ड पर लिखा था: "चाय – 50 पैसे। कैमरा मना है।" और भीड़ वहीं थी। रिक्शेवाले, मज़दूर, स्कूल के बच्चे। कोई रील नहीं बना रहा था, बस चाय पी रहा था, बतिया रहा था।

राघव ने उसी दिन चैनल पर आखिरी वीडियो डाला। सिर्फ 30 सेकंड का। बिना म्यूज़िक, बिना कट। उसने कहा, "हम सब वायरल होने के चक्कर में वो 'लोकल' खो रहे हैं जो हमें इंसान बनाता था। व्यूज़ के लिए दुख दिखाना आसान है, दुख कम करना मुश्किल। मैं दुकान बंद कर रहा हूँ। अगर कहानी अच्छी लगी हो, तो अपने गली के नुक्कड़ पर जाकर एक कप चाय पी आओ। बिल देना मत भूलना। कैमरा बंद रखना।"

स्क्रीन काली हुई। 

संदेश:- 
आज हर जज़्बात कंटेंट है और हर मजबूरी एक ‘थंबनेल’। पर समाज स्क्रीन से नहीं, संवेदना से चलता है। अपलोड करने से पहले ऑफ़लाइन मदद करना सीखें। क्योंकि कुछ कहानियाँ वायरल नहीं, ‘व्यवहार’ में लाई जानी चाहिए।

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी 



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