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"सावन के झूले पड़े"

 

"सावन के झूले पड़े"  
अप्रकाशित मौलिक स्वरचित रचना 


सावन के झूले पड़े तुम चले आओ  
बदरा गरजें, पपीहा गाए, तुम चले आओ  

अम्बुआ की डार झूमें, हरियाली छाई  
मंदिर की घंटी बोले, प्रीत की बंसी बजाई  
मनवा तड़पे, आँखें भर आईं, तुम चले आओ  

पीली चुनरिया, काजल की धार लिए  
महावर रचे पाँव, सपनों का हार लिए  
सरयू सी बहती चाहत, तुम चले आओ  

मेहंदी की खुशबू, गीतों की रात लिए  
बिन तेरे सूना-सूना सारा जहान लिए  
राधा सी रुक गई हूँ, तुम चले आओ  

सावन के झूले पड़े तुम चले आओ  
बदरा गरजें, पपीहा गाए, तुम चले आओ  

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी 

इसे राग काफी या भैरवी में गाया जा सकता है। झूले की सरसराहट और पायल की झंकार वाला भाव है।





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