सत्ता आती -जाती है:व्यंग्य गीत" !
जितना अत्याचार करें कि हो कर ले तू भी भाई,
कभी मनमानी करते थे कांग्रेस और सफाई।
सत्ता के नशे में चूर होकर, संविधान को तोड़ा था,
इमरजेंसी की काली रात में लोकतंत्र को रोड़ा था।
सनातनी धरोहर देख रही है जनता की आंखें,
मंदिर टूटे, मठ लुटे, फिर भी बंधी थीं जुबानें।
वरना तू भी हो जाता अटल बिहारी की भातें,
जिनके सामने झुकी थीं, बड़ी बड़ी बारातें।
समय का पहिया घूमता है, किसी का नहीं रहता,
जो बोएगा काँटे वही, काँटों पर ही चलता।
आज कुर्सी मिली है तो, इतिहास को मत भूल,
कल जनता ही पूछेगी, हिसाब का पूरा फूल।
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