संघर्ष के वो दिन
संस्मरण
वो साल 2014 का था। जेब में 300 रुपये और आंखों में एक सपना। गांव से शहर पढ़ने आया था।
पहले 6 महीने किराया देने के लाले पड़ गए। कमरा 1200 का था, और ट्यूशन से 2000 आते थे। उसमें खाना, किताबें और घर भेजना भी था।
सुबह 5 बजे उठकर अखबार बांटता। 9 से 5 कॉलेज, फिर 6 से 9 ट्यूशन। रात 11 बजे लौटकर लालटेन की रोशनी में पढ़ाई।
सबसे भारी दिन वो था जब माँ का फोन आया - "बेटा, खेत गिरवी रखना पड़ रहा है।" गला भर आया। पर रो नहीं सका। अगले दिन 2 ट्यूशन और पकड़ लीं।
खाना अक्सर रोटी और अचार ही था। दोस्त जब होटल जाते तो मेरा "व्रत है" कहकर टाल देता। जूते का तलवा घिस गया था, पर नए लेने के पैसे नहीं थे।
लोग ताने भी देते - "इतना पढ़कर क्या करेगा, वापस खेती कर ले।" चुपचाप सुन लेता।
आज जब उसी कमरे का किराया 8000 है और बैंक में सैलरी आती है, तब वो दिन याद आते हैं। वो भूख, वो नींद, वो बेइज्जती... सबने मुझे गढ़ा।
संघर्ष ने दो चीजें सिखाईं - "मेहनत से रास्ते बनते हैं" और "गिरकर उठने वाला ही असली विजेता है।"
आज भी कभी घमंड आए तो पुराने जूते देख लेता हूँ। याद आ जाता है कि कहाँ से चला था।
डॉ सुखमंगल सिंह/वाराणसी
शब्द संख्या: 248
Sukhmangal Singh
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