Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"संघर्ष और श्रम"

 

"संघर्ष और श्रम"



सुबह सूरज से पहले  

एक पीठ जागती है चुपचाप,  

और शाम ढले उसी पीठ पर  

थकान अपना बिस्तर बिछा लेती है।


नारे लगाते होंठ झूठ बोल सकते हैं  

पर फावड़े से उठे छाले नहीं,  

ईंटों से छिली उँगलियाँ नहीं।  

संघर्ष मंच का भाषण नहीं है,  

वो रोटी है जो पसीने में सानकर  

नमक के साथ निगली जाती है।

 
उसने वक़्त से कभी छुट्टी नहीं माँगी,  

बस एक दिन की मज़दूरी से  

घर की दीवारों पर हँसी पोत दी।


अजीब है  

दीवारें ऊँची करने वाले के सिर पर छत नहीं,  

सड़कें बुनने वाले के पाँव नंगे।  

फिर भी हर धड़कन में एक फैक्ट्री धड़कती है,  

हर साँस लोहे को गलाकर  

उम्मीद का कोई नया साँचा भरती है।


किताबें अब भी दोहराती हैं  

'परिश्रम का फल मीठा होता है'  

पर कोई उससे पूछे  

जो दिन भर फल तोड़ता है  

और रात को भूखा सोता है।

 
संघर्ष को युद्ध-विराम नहीं चाहिए,  

उसे बराबरी की एक मेज़ चाहिए।  

श्रम को दया की भीख नहीं चाहिए,  

उसे गिनती में अपना नाम चाहिए।

 
जब तक मेहनत का मोल  

सिर्फ बाज़ार की बोली तय करेगी,  

हर चमचमाती इमारत की नींव में  

एक दबाई हुई चीख  

कब तक साँस रोकेगी?

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
 वाराणसी 

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