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समीक्षा: कहानी "बेटी" - डॉ. श्रीमती तारा सिंह"

 


Sukhmangal Singh 


5:29 AM (11 minutes ago)




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"पुस्तक समीक्षा: कहानी "बेटी" - डॉ. श्रीमती तारा सिंह"
स्रोत: DR. TARA SINGH SPECIAL EDITION, पृष्ठ 50, खंड 'स्वर्णविभा'

"विषयवस्तु और मूल भाव"
डॉ. तारा सिंह की यह कहानी "बेटी" भारतीय समाज में बेटी की दोहरी भूमिका पर करुण और मार्मिक टिप्पणी है। लेखिका ने बेटी को 'अमानत' कहा है - एक ऐसा रिश्ता जिसे हम जन्म से पालते हैं, पर जो सदा के लिए हमारी नहीं होती। कहानी का केंद्रीय द्वंद्व यही है: "बेटी पराया धन होती है" इस सामाजिक सोच और माता-पिता के मन के स्नेह के बीच का संघर्ष।

लेखिका दो स्थितियों को आमने-सामने रखती हैं:
1. विदाई की वेला: जब बेटी ससुराल जाती है, माँ-बाप हँस कर विदा करते हैं पर भीतर से टूट जाते हैं। "उस घर वाली बनती है, जहाँ तुम जहाँ आ रहे हो" - यह पंक्ति दहेज नहीं, अधिकार बदलने की पीड़ा कहती है।
2. वापसी की विडंबना: जब वही बेटी दुःखी होकर मायके लौटती है, तो समाज उसे बोझ मानता है। लेखिका पूछती हैं — "क्या तुमने कभी अनुमान लगाया, जिस बेटी के लिए एक बेटी को तुमने सब कुछ लुटाया?" यह प्रश्न सीधे पाठक के ज़मीर को झकझोरता है।

भाषा-शैली और शिल्प:-
भाषा भावप्रवण, सहज और संवाद-शैली में है। "बेटा अपना होता है, बेटी पराया धन" जैसे मुहावरे कहानी को लोक-जीवन से जोड़ते हैं। लेखिका ने करुणा रस को प्रधान रखा है, पर बीच-बीच में व्यंग्य भी चुभता है -"हम उसे पराया धन की उपाधि देकर भी रोते हैं"। 

वाक्य छोटे नहीं हैं, पर प्रवाह ऐसा कि पाठक रुकता नहीं। एक माँ के मन की बात, एक पिता की चुप्पी, समाज का दोहरापन - सब एक ही पृष्ठ पर सिमट आए हैं।

सबल पक्ष:
1. सामाजिक यथार्थ: बेटी के जन्म से लेकर विदाई और फिर संभावित वापसी तक का पूरा चक्र दिखाया गया है। यह हजारों घरों की कहानी है।
2. भावनात्मक गहराई: "कुल की बेटी बनकर भी उसके आँचल का छोर उससे रहता है" - ऐसी पंक्तियाँ सीधे दिल में उतरती हैं।
3. प्रश्न-शैली: लेखिका उपदेश नहीं देतीं, सवाल पूछती हैं। "क्या तुमने कभी.."पाठक को आत्ममंथन पर मजबूर करता है।
निष्कर्ष
"बेटी" कोई कहानी नहीं, समाज का आईना है। डॉ. तारा सिंह ने बिना चीखे-चिल्लाए, बड़ी शालीनता से पितृसत्ता पर चोट की है। यह रचना हर उस माँ-बाप को पढ़नी चाहिए जो बेटी को 'पराया धन' कहते हैं, और हर उस बेटी को जो खुद को 'बोझ' समझने लगती है।

महिला सशक्तिकरण, पारिवारिक मूल्य और हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में शामिल करने योग्य। यह अंश 'स्वर्णविभा' को सचमुच स्वर्ण बना देता है।

पुस्तक समीक्षा: कहानी - "स्वर्णविभा" से, पृष्ठ 51" 
कथानक का सार:
यह कहानी एक हृदयविदारक रूपक है। ससुराल से लौटता दंपति — पति, पत्नी, एक बेटा और एक बेटी — उफनती नदी के किनारे फँस जाता है। उनके पास गहने हैं, दो बच्चे हैं, पर नाव एक ही सामान पार करा सकती है। पति तर्क देता है: "बेटा बुढ़ापे की लाठी है, गहने जीवन का संबल हैं, बेटी तो पराई धन है"। दिल पर पत्थर रखकर वे बेटी को नदी में फेंक देते हैं, बेटे और गहनों के साथ पार उतर जाते हैं।

पर कहानी वहाँ खत्म नहीं होती। सालों बाद गुप्ताजी फूट-फूट कर रोते हैं - "अगर बेटे को फेंका होता तो आज ये दुर्दिन न देखता। बेटी दयालु होती है।" बेटा उन्हें छोड़ चुका है, और वे समझ गए कि उन्होंने खुशियाँ बहा दीं, दुःख गले लगा लिया।

मूल भाव और संदेश:
यह कहानी नहीं, समाज के मुँह पर तमाचा है। लेखिका ने "बेटा कुलदीपक, बेटी पराया धन" वाली सोच को उसके नंगे, क्रूर रूप में दिखाया है। नदी यहाँ सिर्फ जल नहीं, पितृ सत्ता की धारा: है जिसमें सदियों से बेटियाँ बहाई जा रही हैं।

1. व्यंग्य और विडंबना: पति कहता है - "बिना धन के बेटा कैसे जीएगा?" पर अंत में धन होते हुए भी बेटा साथ नहीं देता। लेखिका पूछती हैं: फिर किसके लिए बेटी को मारा?
2. पश्चाताप: गुप्ता जी का रोना सिर्फ एक बाप का नहीं, पूरे समाज का सामूहिक पश्चाताप है। "ईश्वर! कोई दूसरा बाप मेरी तरह बेटी के लिए कसाई न बने" -यह पंक्ति आत्मा को चीर देती है।
3. करुणा रस: ओज नहीं, विद्रोह नहीं -यहाँ करुणा अपने चरम पर है। पाठक का गला भर आता है, आँखें भीग जाती हैं।

भाषा-शैली:
डॉ. तारा सिंह की भाषा सरल है, पर शब्दों में आग है। संवाद-शैली कहानी को नाटकीय बनाती है। "दिल पर पत्थर रखकर", "खुशियों को नदी में बहाकर" जैसे प्रयोग बिंब रचते हैं। कहानी छोटे आकार में महाकाव्य जैसा प्रभाव छोड़ती है।

सबल पक्ष
1. तीखा सामाजिक हस्तक्षेप: 'बेटी बचाओ' का नारा लगाने से पहले यह कहानी 'बेटी बहाओ' की मानसिकता को मारती है।
2. पात्रों का यथार्थ: गुप्ता जी खलनायक नहीं, हमारे बीच का आम आदमी है। इसलिए उसका दर्द और सच्चा लगता है।
3. अंत की चोट: सुखांत नहीं, सत्यांत है। यही इसे अविस्मरणीय बनाता है।

सीख:-
यह रचना बताती है कि बेटी 'पराया धन' नहीं, 'पुण्य का धन' है। जो उसे बहाते हैं, वे अंत में खुद खाली हाथ रह जाते हैं।

निष्कर्ष:
यह एक पृष्ठ की कहानी नहीं, एक युग का दस्तावेज़ है। स्कूल, कॉलेज, पंचायत -हर जगह पढ़ी जानी चाहिए। डॉ. तारा सिंह ने कलम से बेटियों की चिता को कंधा दिया 

हर माता-पिता, हर बेटे को एक बार यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए। शायद फिर कोई गुप्ता जी अपनी बेटी न बहाए।

- सुख मंगल सिंह, 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत!


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