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"समाज का कर्ज़"

 

         "समाज का कर्ज़"
                      अप्रकाशित लघु-कथा

गाँव रामपुर में पंचायत भवन के बाहर बैनर टंगा था - "गाँव का मेला, सबका न्योता"। ढोलक की थाप दूर तक जा रही थी।

इलाहाबाद से राम लखन उतरा तो सीधा बड़े भाई मस्तराम के पास पहुँचा। तीन साल बाद लौटा था। मस्तराम ने गले लगाया, माथा चूमा, फिर धीरे से बोले - "आ गया तू। अच्छा किया। समाज का कर्ज़ उतारने का मौका भी है कल। मेला कमेटी में बैठना।"

राम लखन ने जेब से लिफाफा निकालकर भाई के हाथ में रखा - "भाई, गाँव के स्कूल की छत के लिए। वादा किया था।" मस्तराम की आँखें भर आईं। बोले - "यही तो कर्ज़ है बेटा। खून-पसीने का नहीं, मिट्टी का।"

अगली सुबह राम लखन कुर्ता-धोती संभालकर पंचायत भवन की तरफ चला। रास्ते में गोल वाले चबूतरे पर गाँव के बड़े-बूढ़े ताश खेल रहे थे। राम लखन ने झुककर पैर छुए - "काका, राम-राम। मेला देखने चला था।" 

सबने सिर हिलाया। चाय का घूंट भरा। कोई बोला नहीं। कोई बुलाया नहीं। 
राम लखन वहीं खड़ा रहा। समझ गया - शहर से कमाकर लौटा हूँ, पर 'अपना' नहीं रहा।

वो लौट आया। मस्तराम ने पूछा - "गया नहीं मेला?" 
राम लखन हँस दिया - "भाई, जहाँ बुलावा न हो, वहाँ जाना बेअदबी है।"

दूसरे दिन तड़के इलाहाबाद वाली बस पकड़ ली। स्टेशन पर मस्तराम छोड़ने आए। आँखें नम थीं। बोले - "रुक जा लखन। दो बात और..."

तभी पीछे से आवाज़ आई - "प्रदुमन! आना ही नहीं चाहिए था। शहर की हवा लग गई है। अब गाँव का नमक कहाँ हज़म होगा?"

राम लखन पलटा। बोलने वाला उसका हमउम्र था, जिसके बाप का इलाज उसने इलाहाबाद में करवाया था। राम लखन ने कुछ नहीं कहा। बस मस्तराम के पैर छुए।

ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से मस्तराम देखते रहे। राम लखन ने भीतर से कहा - "भाई, समाज का कर्ज़ पैसों से उतरता है। पर अपनापन उधार नहीं मिलता। वो कमाना पड़ता है। और जब वो न मिले, तो चुपचाप निकल जाना ही सबसे बड़ा सम्मान है।"

मस्तराम चबूतरे तक गए। वहीं बैठे बूढ़ों से बोले - "गोल में बुलावा न देना, यही तुम्हारा फैसला था न? अब कर्ज़ किस पर रहेगा? उस पर जिसने छत दी, या हम पर जिन्होंने दिल का दरवाज़ा बंद किया?"

गोल में सन्नाटा था। ढोलक अब भी बज रही थी। पर उसकी धुन किसी को अच्छी नहीं लग रही थी।

सच तो ये है - कर्ज़ पैसों का नहीं होता। कर्ज़ उस नज़र का होता है जो लौटकर आए बेटे को 'प्रदुमन' कह दे।।

- डॉ. सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 
Sukhmangal Singh




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