Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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" समाज का कर्ज: एक संस्मरण"

 
" समाज का कर्ज: एक संस्मरण"

रामलखन को राजधानी की दवा बीच में ही छोड़नी पड़ी। डॉक्टर ने मना किया था - "तबीयत संभालो, अभी सफर मत करो।" पर चिट्ठी हाथ में आते ही सब भूल गया। 

बख्तियार सिंह नहीं रहे। 

गांव के बख्तियार काका। वही जिन्होंने बरसों पहले, रामलखन को अनजाने में सूरा पान पिला दिया था। साथ में थे पीसून सिंह। रामलखन आज भी याद करता है - पीसून का ठहाका, बख्तियार का वो भोला सा आग्रह "एक घूंट तो पी बेटा"। पीसून सिंह तो कब के इस लोक से जा चुके। अब बख्तियार भी चले गए। 

क्रिया-कर्म बाकी था। और समाज में रहना है तो समाज के धरम निभाने पड़ते हैं।

रामलखन की तबीयत जवाब दे रही थी। बुखार था, कमजोरी थी। राजधानी की भीड़, डॉक्टर की पर्ची, दवा का समय - सब छूट गया। उसने बैग में बस दो जोड़ी कपड़े और दवा की शीशी रखी। मन में एक ही बात - "जिसने पहली बार पिला कर होश संभालना सिखाया, उसके अंतिम घूंट में तो शामिल होना ही है।"

गांव पहुंचा तो सरयू की हवा लगी। घर के बाहर भीड़ थी। सफेद धोती में लिपटा बख्तियार का चेहरा वैसा ही भोला था। रामलखन को देखते ही बूढ़ी काकी फूट-फूट कर रो पड़ीं - "आ गया बेटा, तेरे काका तुझे ही याद कर रहे थे।"

क्रिया-कर्म में बैठा रामलखन। मंत्र चल रहे थे, अग्नि धधक रही थी। उसे पीसून सिंह की याद आ गई। वही पीसून जो कहते थे "समाज है तो हम हैं बेटा। अकेले आदमी का कोई मोल नहीं।" आज पीसून नहीं थे, पर उनकी कही बात कानों में गूंज रही थी।

रात को खिचड़ी बंटी। लोग मिल रहे थे, हाल पूछ रहे थे। किसी ने कहा "तबीयत ठीक नहीं है तो क्यों आए?" रामलखन बस मुस्कुरा दिया। जवाब में क्या कहता? 

समाज है। समाज में रहना है। जीवन समाज के साथ ही चलता है। 

बख्तियार काका ने अनजाने में सूरा पिलाकर उसे दुनिया का पहला सबक दिया था - "जोश में आकर किए काम का भी हिसाब रखना पड़ता है।" आज उनके जाने पर रामलखन को दूसरा सबक मिल गया - "हिसाब-किताब से बड़ा होता है नाता।"

राजधानी लौटते समय रामलखन ने सरयू तट पर माथा टेका। बुखार अब भी था, पर मन हल्का था। दवा शरीर की होती है। कर्ज समाज का उतारने से आत्मा की दवा हो जाती है।

पीसून सिंह चले गए। बख्तियार सिंह चले गए। पर उनके दिए सबक रामलखन के साथ चल रहे थे। यही तो गांव है। यही तो समाज है।

आप चाहें तो इसे और संक्षिप्त करके पत्रिका के लिए 200 शब्द में ढाल दूँ, या बख्तियार  के चरित्र को और उभार दूँ?
डॉ सुखमंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 
Sukhmangal Singh

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