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समीक्षा : स्वयंप्रभा (खण्डकाव्य) एवं छह कृतियाँ

 

समीक्षा : स्वयंप्रभा (खण्डकाव्य) एवं छह कृतियाँ


1. ग्रन्थ विवरण

पुस्तक का नाम - "स्वयंप्रभा"
विधा - खण्डकाव्य (सप्त सर्गात्मक) + 6 सहायक कृतियाँ
रचनाकार - आचार्य भानुदत्त त्रिपाठी 'मधुरेश' (जन्म 14 जनवरी 1937, ग्राम-बजेहरा, उन्नाव)
प्रकाशक - कृष्णा प्रकाशन, हिमांशु सदन, 5-पार्क रोड, लखनऊ
प्रकाशन वर्ष - प्रथम संस्करण गंगा दशहरा 1995, वर्तमान परिवर्धित संस्करण 2026
पृष्ठ - लगभग 120, मूल्य - समीक्षार्थ प्रति
प्राप्त - सर्वजन हिताय साहित्यिक समिति, बालागंज, लखनऊ के सौजन्य से।

आचार्य जी 65 ग्रन्थों के प्रणेता, ब्रजभाषा साहित्य सम्मान, महामहोपाध्याय (मानद), विद्यासागर, साहित्य भूषण आदि 50 से अधिक सम्मानों से विभूषित हैं। आपके गुरु राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी हैं।

2. विषय वस्तु - क्यों है स्वयंप्रभा महत्वपूर्ण ?

रामकथा में स्वयंप्रभा एक विस्मृत पात्र है। गोस्वामी तुलसीदास ने "राम काज सब करिहहु-" कह कर केवल एक अर्धाली में समेट दिया। वाल्मीकि रामायण (किष्किन्धा काण्ड सर्ग 49-52) में केवल 25 श्लोकों में कथा है।

आचार्य जी ने अपनी 'आत्मिका' में बहुत स्पष्ट लिखा है - "यदि स्वयंप्रभा का दर्शन वानरों को न होता तो वानरों का ही नहीं, रामकथा का भी अनिष्ट हो जाता।"

कथा का क्रम जो इस खण्डकाव्य में है :-

प्रथम सर्ग - सीता अन्वेषण हेतु अंगद के नेतृत्व में हनुमान आदि का दक्षिण प्रस्थान, विन्ध्याटवी का भयावह वर्णन।

द्वितीय सर्ग - ऋक्ष बिल में प्रवेश, हनुमान द्वारा जल-विहंगों को देखकर जलाशय का अनुमान, अन्धकार मय बिल का वर्णन।
 तृतीय-चतुर्थ सर्ग - बिल के भीतर स्वर्णिम लोक का दर्शन। कांचन कमलों से भरे सरोवर, मणि-मरकत के तटबंध, स्वर्णिम वृक्ष-फल-फूल, हवि-कुण्ड और उसमें ध्यानस्थ स्वयंप्रभा का दर्शन।
पंचम सर्ग - हनुमान-स्वयंप्रभा संवाद। हनुमान द्वारा संक्षेप में रामकथा कहना - ताड़का वध से बालि वध तक। आपके द्वारा भेजे गये पृष्ठ 24 से 31 तक यही अंश है।
षष्ठ-सप्तम सर्ग - स्वयंप्रभा द्वारा आतिथ्य, वानरों को बिल से बाहर निकालकर दक्षिण समुद्र तट पर पहुँचाना और राम काज में आगे बढ़ने का आशीर्वाद।

इसके साथ जो 6 अन्य कृतियाँ जोड़ी गई हैं - " श्रीराम कृपास्तोत्र, श्रीराम रसायन, दीनबन्धु स्तोत्र, श्रीरामलला स्तोत्र, जयरामलला, हाडक माला* - वे भक्ति-साहित्य की स्वतंत्र धारा हैं। विशेषकर 'श्रीरामलला स्तोत्र' वर्तमान अयोध्या आन्दोलन की पृष्ठभूमि में अत्यन्त प्रासंगिक है।

3. काव्य-सौष्ठव पर समग्र दृष्टि

क) भाषा-शिल्प :- खड़ी बोली हिन्दी में अवधी-ब्रज की कोमलता। आचार्य जी की भाषा संस्कृतगर्भित होते हुए भी बोझिल नहीं।

उदाहरण -
तप करने से नव कुन्दन-सी थी देवी की देह।
मानो, वह ही स्वयं बनी हो दिव्य प्रभा का गेह।

यहाँ 'कुन्दन-सी देह' और 'प्रभा का गेह' में यमक और रूपक का सहज प्रयोग है।

ख) प्रकृति चित्रण :- आपके द्वारा भेजे पृष्ठ 16-18 कवि की चित्रात्मक प्रतिभा के प्रमाण हैं -

स्वर्णिम पद्म-पराग बिछे थे सर-जल पर भरपूर।
मानो, सर-लक्ष्मी का जल पर बिखरा हो सिन्दूर।।
 स्वर्णिम मत्स्यों से रञ्जित था ह्रद का हृदय गंभीर।
दर्पण के सम दमक रहा था उसका निर्मल नीर।।

'स्वर्णिम' शब्द की 15 बार आवृत्ति एक स्वप्नलोक रचती है, जो पाठक को भौतिक जगत से अलग करती है।

ग) नायिका-निरूपण :- स्वयंप्रभा का रूप-वर्णन इस काव्य की आत्मा है।

शुद्ध सत्त्व-सी सौम्य-शान्त थी मुखमण्डल की कान्ति।
रति ही विरति बनी बैठी ज्यों, होती थी यह भ्रान्ति।।
भव्य कृष्णमृग-चर्म और था वल्कल तन-परिधान।
ध्यानमग्न थी वह तपस्विनी योगी-यती-समान।।

रति और विरति का एक साथ होना - यही भारतीय नारी का आदर्श है। कवि ने उसे भोग्या नहीं, पूज्या बनाया है।

घ) प्रबन्ध-कौशल और दर्शन :-  कवि बीच-बीच में सूत्र-वाक्य देता चलता है, जो काव्य को केवल कथा नहीं, जीवन-दर्शन बनाते हैं: -

साहस-बिना न संभव होते साधन-धन से कार्य।
अतः सिद्धि के लिये लोक में साहस है अनिवार्य।। 59।।

 जल ही जीवन है हम सबका, जल ही है उपचार।
जल के बिना नहीं रह सकता हरा-भरा संसार।।

ये पंक्तियाँ आज के पर्यावरण और युवा-मानस दोनों के लिए सन्देश हैं।

ङ) छंद-विधान :- दोहा-चौपाई-शैली, कहीं-कहीं हरिगीतिका। लय बाधित नहीं होती। पठनीयता उच्च कोटि की है।

4. सबल पक्ष और सीमाएँ

सबल पक्ष -
1.  एक उपेक्षित पौराणिक पात्र का उद्धार और उसे नायिका बनाना - मौलिक शोध-दृष्टि।
2.  रामकथा की प्रामाणिकता को खण्डित किये बिना काव्यात्मक स्वतंत्रता।
3.  भक्ति और श्रृंगार का मर्यादित समन्वय।
4.  भाषा की शुद्धता - अश्लील या बाजारू शब्दों से सर्वथा मुक्त।

सुझाव -
1.  कुछ स्थलों पर 'स्वर्णिम' की अतिरेक आवृत्ति से पुनरुक्ति दोष लगता है, पर्याय प्रयोग से बचा जा सकता था।
2.  यदि संस्कृत मूल श्लोकों को पाद-टिप्पणी में दिया जाता तो शोध-छात्रों के लिए अधिक उपयोगी होता।
3.  आवरण पर लेखक का चित्र और पीछे ब्लर्ब में समीक्षात्मक सम्मतियाँ जोड़ी जा सकती थीं।

5. अन्तिम मूल्यांकन

'स्वयंप्रभा' केवल खण्डकाव्य नहीं, आचार्य मधुरेश जी की 60 वर्ष की साधना का निचोड़ है। जिस प्रकार 'साकेत' में उर्मिला, 'प्रियप्रवास' में राधा को केंद्र में लाया गया, उसी परम्परा में 'स्वयंप्रभा' में एक तपस्विनी को केंद्र में लाना हिन्दी काव्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

यह कृति एक साथ तीन वर्गों को तृप्त करती है - सामान्य पाठक को कथा से, भक्त को राम-भक्ति से और शोधार्थी को नव्य सामग्री से।

मैं कृष्णा प्रकाशन और सर्वजन हिताय समिति को साधुवाद देता हूँ कि उन्होंने इस अमूल्य कृति को 'वितरणार्थ/उपयोगार्थ' भाव से सुलभ कराया। यह ग्रन्थ प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय के पुस्तकालय, रामकथा पर शोध करने वाले शोधार्थी और रामभक्त के घर में होना चाहिए।

अनुशंसा - उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, ब्रज साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार हेतु विचारणीय एवं विश्वविद्यालयों के एम.ए. (हिन्दी) पाठ्यक्रम में 'रामकाव्य के आधुनिक रूप' के अन्तर्गत पठनीय।


समीक्षक :
डॉ सुखमंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश 
साहित्यिक सहयोगी




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