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"रामलीला का एक दृश्य - संवादों के माध्यम से"

 
"रामलीला का एक दृश्य - संवादों के माध्यम से"
विधा - नाट्य लेखन - संवाद 

 प्रसंग - केवट और श्रीराम का प्रसंग

दृश्य परिचय: -
सरयू तट। वनगमन की पहली सुबह। भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी वन की ओर जा रहे हैं। सामने विशाल नदी। नदी पार करनी है। तट पर केवट अपनी नाव की मरम्मत कर रहा है। राम उसे पुकारते हैं।

पात्र -
1. श्रीराम
2. केवट
3. लक्ष्मण
4. माता सीता (मौन उपस्थिति)


[पर्दा खुलता है। नदी का कल-कल नाद। केवट नाव पर बैठा गुणगुना रहा है]

श्रीराम: - (मुस्कुराते हुए) भैया केवट! सुनो तो, हमें उस पार जाना है। अपनी नाव इधर ले आओ।

केवट: - (हाथ जोड़कर, थोड़ा सकुचाते हुए) सरकार! आपको तो पहचानता हूँ मैं। आप तो अयोध्या के राजकुमार राम हो न? पर... मैं नाव न ले आऊँगा।

लक्ष्मण :- (आश्चर्य से) क्यों? क्या तुम्हें राजाज्ञा का भय नहीं? हम वनवासी हैं, हमें पार जाना है।

केवट: - (डरते-डरते) भैया, गुस्सा न हो। मैंने सुना है, आपके चरणों में कोई जादू है। पत्थर भी नारी बन जाता है। मेरी तो यही एक नाव है, यही मेरे बच्चों की रोजी-रोटी है। अगर यह भी नारी बन गई तो मैं क्या करूँगा? भूखों मर जाऊँगा।

श्रीराम :- (हँसते हुए) अरे वाह केवट! तुम तो बड़े चतुर हो। तो तुम चाहते क्या हो?

केवट: - पहले मुझे आपके चरण धोने दो। आपके चरण धुल जायेंगे तो मेरी नाव सुरक्षित रहेगी। फिर मैं आपको हँसी-खुशी पार करा दूँगा, बिना उतराई के।

लक्ष्मण: - (हल्का मुस्कुराते हुए) ये कैसी शर्त है?

केवट: - यही मेरा नियम है सरकार। गंगा मैया की सौगंध, बिना चरण धोये नाव पर न चढ़ाऊँगा।

श्रीराम: - (माता सीता की ओर देखकर) सीते, देखो तो इस भक्त का प्रेम। यह डर नहीं, प्रेम की चतुराई है। ठीक है केवट, जैसी तुम्हारी इच्छा।

[केवट दौड़कर एक कठौता लाता है। आँखों में आँसू। कांपते हाथों से राम के चरण धोता है। चरणोदक को सिर पर लगाता है]

केवट: - (भाव-विभोर) आज मेरे जन्म-जन्म के भाग्य जाग गये। जिन चरणों को ब्रह्मा तरसते हैं, आज वो मेरे हाथों में हैं।

श्रीराम: - (उसके कंधे पर हाथ रखते हुए) केवट, तुम्हारी भक्ति ने हमें खरीद लिया। अब तो पार करा दो।

केवट: - (नाव की ओर इशारा करते हुए) आइये प्रभु! मेरी नाव नहीं, मेरा जीवन आपका है। बैठिये।

[तीनों नाव में बैठते हैं। केवट नाव चलाता है। पर्दा धीरे-धीरे बंद होता है]

केवट :- (आकाश की ओर देखकर) इस नदी को पार नहीं करा रहा हूँ प्रभु, मैं तो अपना भवसागर पार कर रहा हूँ।

समापन संदेश - यह प्रसंग सिखाता है कि भक्ति में भय नहीं, सरलता और चतुर प्रेम होता है, और ईश्वर भक्त के प्रेम के आगे हमेशा झुक जाता है।

जय श्रीराम!
-सुख मंगल सिंह
     वाराणसी 



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