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"राम लखन की ग्राम सोगाईं चंदौली जनपद यात्रा"

 

"राम लखन की ग्राम सोगाईं  चंदौली जनपद यात्रा"

30 जून 2026, भोर 4:15 से आरंभ 

भोर के 4 बजकर 15 मिनट हुए थे। अँधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था। तभी राम लखन के फोन की घंटी बजी। उधर से बूढ़े मित्र हिम्मती बावरा जी की काँपती आवाज आई। साँय-साँय करते हुए बोले, "भाई, तबीयत ठीक नहीं है। तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"  

राम लखन ने ढाँढस बँधाया, "बाबूजी, घबराइए मत। मैं अनपढ़ से बात कर लेता हूँ। अगर वह तैयार हुआ तो आज ही निकलता हूँ, वरना कल सुबह जरूर पहुँचूँगा।"  

तुरंत अनपढ़ जी को फोन लगाया। बाबूजी की तबीयत खराब सुनते ही अनपढ़ बोला, "भैया, बस नहा धोकर निकल रहा हूँ। मुगलसराय में मिलते हैं।"  

इधर राम लखन भी फुर्ती में आ गया। जल्दी से मंजन किया, फ्रेश हुआ, स्नान किया। बैग उठाया। उसमें जरूरी दवाइयाँ रखीं। दाँत में दर्द था इसलिए प्लास्टिक की पाइप रख ली, ताकि पानी उसी से खींचकर पी सके।  

मोटरसाइकिल की चाबी, कागज और हेलमेट संभाला। निकलने से पहले किराएदार अजनबी को फोन किया, "भैया, चाबी ले लीजिए। मुझे गाँव जाना है। मित्र की तबीयत खराब है।"  

अजनबी आया। सोमवार शाम की बनी मछली बची थी। मंगलवार होने के कारण अजनबी पति-पत्नी नहीं खाते। वह मछली लाकर राम लखन को दे गया। राम लखन ने खा ली, ताकत जरूरी थी।  

पेट पूजा के बाद राम लखन चंदौली जिले के सोगाईं गाँव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में मुगलसराय रुका। देखा अनपढ़ जी का टेंपो अभी बहुत पीछे है।  

इंतजार में वह कोलकाता से पेशावर जाने वाली जीटी रोड के नीचे, ओवर ब्रिज की छाँह में बैठ गया। गरमी और चिंता दोनों थी। कुछ ही देर में दूर से टेंपो आता दिखा। अनपढ़ जी आ गए।  

दोनों मित्रों ने एक दूसरे का हाल पूछा और सोगाईं की आगे की यात्रा की तैयारी करने लगे। बूढ़े हिम्मती बावरा जी का चेहरा दोनों की आँखों के सामने था।  

कथा का मर्म: 
यह यात्रा सिर्फ सोगाईं की नहीं, दोस्ती और फर्ज की है। भोर के फोन ने बता दिया कि रिश्ते खून से नहीं, दर्द बाँटने से बनते हैं। राम लखन अनपढ़ नहीं, दिल का पढ़ा-लिखा निकला।

"कोई नहीं जगत में पूरा"  
(संत कबीर शैली में साखी-गीत)

कोई नहीं जगत में पूरा, सबमें कुछ ना कुछ अधूरा,  
चाँद में भी दाग लगे हैं, सूरज में भी धूप कड़वा॥  

ज्ञानी कहे मैं सब जानूँ, पर मन का हाल न जाने,  
धनवान कहे मैं सुखिया, पर नींद रात भर न माने॥  

साधु बने जो जटा बढ़ाकर, भीतर लोभ की झोली,  
राजा बने जो सिंहासन पर, डर से काँपे बोली॥  

मंदिर-मस्जिद जाने वाले, दिल में मैल पुराना,  
माला फेरे लाख करोड़, पर मन न हुआ ठिकाना॥  

कबीर खड़ा बाजार में, सबकी पोल बताता,  
अपने गिरेबान में झाँके, वो ही सच्चा ज्ञाता॥  

आधा गगरी छलकत जाए, भरी गगरी चुप साधे,  
जो पूरा होने का दम भरे, वो सबसे बड़ा आधे॥  

पानी में मीन प्यासी, सुन-सुन आवत हाँसी,  
घट ही में है पूरा साहिब, ढूँढे फिरे उदासी॥  

कहत कबीर सुनो भाई साधो, पूरा वो ही सोए,  
जो अपना अवगुण देखे, और जग का गुण रोए॥  

ना कोई ऊँचा ना नीचा, सब विधना की माया,  
जो अपने को लघु कर जाने, उसने हरि को पाया॥  

पूरा कहे तो शून्य रहे, शून्य ही पूरण होई,  
मिटे जो "मैं-मैं" का फेरा, तो राम न बिसरे कोई॥  

"मित्र धर्म"  
4 पंक्तियों में सार

भोर का फोन बना आदेश, नींद उड़ी, दौड़ा दिल,  
दोस्ती का कर्ज चुकाने, निकला राम लखन अनिल।  
रिश्ता खून से नहीं बनता, दर्द बाँटने से बनता,  
मित्र वही जो आधी रात में, बिन बोले सब समझता॥  


आगे की कहानी: सोगाईं पहुँचने तक  

ओवर ब्रिज के नीचे दोनों मित्र गले मिले। अनपढ़ जी ने टेंपो से पानी की बोतल निकाली, "भैया, मुँह धो लो। धूप चढ़ रही है।" राम लखन ने पाइप से एक घूँट पानी खींचा। दाँत का दर्द टीस मार रहा था, पर हिम्मती बाबूजी का चेहरा सामने था।  

अनपढ़ ने कहा, "तुम बाइक से आगे चलो, मैं टेंपो से पीछे आता हूँ। गाँव के कच्चे रास्ते में बाइक ठीक रहेगी।" राम लखन ने हेलमेट कसा और चल दिया। मुगलसराय से सैयदराजा, फिर चंदौली पार करते-करते 9 बज गए।  

धूप अब सिर पर थी। सड़क किनारे नीम की छाँह में दोनों रुके। अनपढ़ झोले से गुड़ और सत्तू निकाला, "खा लो भैया। बाबूजी हमेशा कहते थे, खाली पेट दुश्मन भी कमजोर लगता है, दोस्त तो और कमजोर दिखेगा।" दोनों ने दो घूँट पानी के साथ सत्तू खाया।  

11 बजे के करीब सोगाईं गाँव की मेड़ दिखी। दूर से ही हिम्मती बावरा जी का ईंट वाला घर दिख रहा था। आँगन में भीड़ थी। राम लखन का कलेजा मुँह को आ गया। बाइक की रफ्तार और बढ़ा दी।  

दरवाजे पर पहुँचते ही बावरा जी की बेटी दौड़कर आई, "भैया, आप आ गए। बाबूजी सुबह से आपका ही नाम ले रहे थे।" राम लखन बैग से दवा निकालता हुआ भीतर भागा।  

खाट पर लेटे हिम्मती बाबूजी की आँखें बंद थीं। साँस साँय-साँय चल रही थी। राम लखन ने उनका हाथ थामा। बूढ़ी उँगलियों में हलकी सी हरकत हुई। बाबूजी ने आँख खोली और धीरे से कहा, "आ गया रे लखन... अब चिंता नहीं।"  

अनपढ़ जी पीछे से आ गए थे। टेंपो की आवाज सुनकर गाँव के दो-चार लोग और जुट गए। राम लखन ने डॉक्टर को फोन लगाया। गाँव की मिट्टी, नीम की हवा और दोस्तों का साथ — तीनों मिलकर हिम्मती बाबूजी की साँसों को थाम रहे थे।  

शेष आगे. 

बाबूजी की आँखों में नमी और होंठों पर हलकी मुस्कान देखकर राम लखन समझ गया — समय पर पहुँचना ही सबसे बड़ी दवा थी। शेष आगे:

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 


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