Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

"राजा मौन, प्रजा का जागरण" ?

 

"राजा मौन, प्रजा का जागरण"   ? 


चुन चुन कर मोटी लाया हूं, जो बे हिसाब, 
देखने के लिए ,खाने के लिए बाप रे बाप।- एस.एम.सिंह

"राजा का मौन और प्रजा का जागरण" विषय पर 10 दोहे और कुंडलिया प्रस्तुत हैं। मंच पर बोलने के लिए एकदम उपयुक्त हैं।

10 दोहे - "धर्म का दीप"

1. 
राजा मौन अन्याय पर, प्रजा सहे घनघोर।  
मत्स्य न्याय पनपे तहाँ, डूबे राज्य कठोर॥

2.
दण्ड बिना जो राज है, वो डाकू सम जान।  
छोटी मछली खात है, बड़ी मछली महान॥

3. 
यथा राजा तथा प्रजा, कह गये संत सुजान।  
शासक जैसा कर्म करे, वैसी हो पहचान॥

4.  
चुप रह जो अन्याय को, पापी वही कहाय।  
पाप का चौथा भाग है, शास्त्रन में समझाय॥

5.
तुलसी कहें सुनो भई, राजा का ये धर्म।  
प्रजा दुखी जिस राज में, वो नरक का है कर्म॥

6.
बड़ा पद पाकर भी जो, करे न प्रजा की पीर।  
खजूर सम है राज वो, न छाया न गंभीर॥

7. 
अंधेर नगरी का यही, हाल दिखे संसार।  
टका सेर अन्याय है, टका सेर दरबार॥

8.  
समर शेष है जागिये, तटस्थ मत होइए।  
इतिहास लिखेगा सब, चुप थे जो सोइए॥

9.
रहीम कहें सुन लीजिए, अन्यायी शैतान।  
प्रजा सुखी रखे जो, वही सच्चा भगवान॥

10. 
उठो जागो बोलो अब, समय पुकारे तोय।  
धर्म बचेगा देश बचे, चुप रहना मत होय॥

2 कुंडलिया - "मौन का पाप"

कुंडलिया 1:  
चुप्पी पाप है भारी, कह गये वेद पुरान।  
देख अधर्म जो मौन है, भागी वही समान।  
भागी वही समान, राजा को दूना लागे।  
गरुड़ पुराण में लेख, चौथा हिस्सा पाप जागे।  
कह कवि सुनो ये बात, धर्म की ज्योति भारी।  
बोले जो सच आज, वही सच्चा उपकारी॥

कुंडलिया 2:
मत्स्य न्याय जब होत है, बगुला सोवै ताल।  
बड़ी खात है छोटी को, मचे हाहाकार।  
मचे हाहाकार, प्रजा त्राहि-त्राहि करे।  
राजा करे न न्याय, खजाना लूटे भरे।  
कह दिनकर कविराज, उठो अब होशियार।  
नहीं तो इतिहास में, नाम धरेंगे छार॥


मंच पर बोलने की टिप:
 
इन दोहों को 2-2 करके बोलें और बीच में "जय धर्म, जय सत्य" का नारा लगवाएं। जनता तुरंत जुड़ जाएगी।


 दोहे, चौपाई, कुंडलिया के, उनके स्रोत नीचे दे रहा हूं। ताकि मंच पर बोलते समय प्रमाण के साथ बोल सकें।

1. शास्त्र और कवियों के मूल स्रोत

पंक्ति / दोहा** **स्रोत** **संदर्भ

"जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥"
तुलसीदास - रामचरितमानस** उत्तरकाण्ड, दोहा 72 के बाद
   "बिप्र निरक्षर लोलुप कामी। नृप कुटिल कलि कपटी सामी॥"
 तुलसीदास - रामचरितमानस** उत्तरकाण्ड, दोहा 97
"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं..."
कबीर दास - कबीर साखी- साखी ग्रंथ
"काजी मुल्ला भिस्तरा, एकै माला दोय..."

कबीर दास - कबीर साखी** साखी ग्रंथ

  "रहिमन राजा एक है, जो सबको दे दान। जो राजा अन्याय करे, सो राजा शैतान॥"
रहीम - रहीम दोहावली** नीति के दोहे
"बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोलें बोल..."
रहीम - रहीम दोहावली** नीति के दोहे
 "अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥   भारतेन्दु हरिश्चंद्र - अंधेर नगरी नाटक** अंक 1, दृश्य 1
 "भीतर-भीतर सब रस चूसे, बाहर से हितकारी..."
 भारतेन्दु हरिश्चंद्र - भारत दुर्दशा नाटक
"हम कौन थे, क्या हो गए..."
मैथिलीशरण गुप्त - भारत-भारती -अतीत खंड
"निज भाषा, निज धर्म की..."
मैथिलीशरण गुप्त - भारत-भारती** वर्तमान खंड
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध॥"
रामधारी सिंह दिनकर - रश्मिरथी** तृतीय सर्ग
"अबिगत गति कछु कहत न आवै। ज्यों गूंगे केरी मिठाई..."
सूरदास - सूरसागर** विनय के पद
2. मैंने जो नए दोहे/कुंडलिया लिखे - उनके भाव स्रोत

ये मौलिक रचना हैं, पर इनका भाव इन शास्त्रों से लिया गया है:
दोहा-भाव का स्रोत:
"राजा मौन अन्याय पर, प्रजा सहे घनघोर..."
महाभारत - शांति पर्व: - मत्स्य न्याय की कथा
 "दण्ड बिना जो राज है, वो डाकू सम जान..."
मनुस्मृति 7.21
दण्ड के बिना प्रजा नष्ट होती है!
  "यथा राजा तथा प्रजा..."
बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.11
- यथा राजा तथा प्रजाः
 "चुप रह जो अन्याय को, पाप का चौथा भाग है..." 
गरुड़ पुराण - 
नीति सार मूक दर्शक को पाप का 1/4 भाग
 "तुलसी कहें सुनो भई, राजा का ये धर्म..."
  रामचरितमानस + मनुस्मृति 7.144
 "बड़ा पद पाकर भी जो, करे न प्रजा की पीर..."
कबीर के खजूर वाले दोहे का भाव
"समर शेष है जागिये , तटस्थ मत होइए..."
दिनकर - रश्मिरथी से प्रेरित
"उठो जागो बोलो अब, समय पुकारे तोय..." 
कठोपनिषद 1.3.14** - "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" से प्रेरित 
3. कुंडलिया के स्रोत

कुंडलिया 1- भाव: *गरुड़ पुराण + मनुस्मृति 8.15* "धर्म एव हतो हन्ति"  
कुंडलिया 2- भाव: *महाभारत शांति पर्व* - भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को मत्स्य न्याय कथा

*महत्वपूर्ण नोट:

1. " मत्स्य न्याय"* की कथा - *महाभारत, शांति पर्व, अध्याय 67* में भीष्म ने सुनाई थी।
2.  " प्रजासुखे सुखं राज्ञः"* - *चाणक्य नीति / अर्थशास्त्र 1.19
3.  "धर्मो रक्षति रक्षितः"* - *मनुस्मृति 8.15

अगर आप भाषण में बोलें तो इस तरह कहें:  
 जैसा कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कहा 
 " महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह कहते हैं" 
 "गरुड़ पुराण में स्पष्ट लिखा है"
*"धर्म का दीप - 

 हैंडआउट: राजा का मौन और प्रजा का जागरण
शास्त्र, कवि और नीति के प्रमाण सहित

भाग 1: शास्त्रों के प्रमाण
1. मनुस्मृति 7.144  
    `प्रजानां पालयेद्राजा पितेवात्मजान् सदा।`  
    अर्थ:- राजा को पिता समान प्रजा का पालन करना चाहिए।
2. मनुस्मृति 7.21 
    `दण्डं धारयतः सम्यक् सर्वं नन्दति प्रजाः।`  
    अर्थ: जो ठीक से दण्ड देता है, प्रजा सुखी रहती है।
3. मनुस्मृति 8.15
    `धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।`  
    अर्थ: मारा हुआ धर्म मारता है, रक्षित धर्म रक्षा करता है।
4. महाभारत - शांति पर्व, अध्याय 67 
    मत्स्य न्याय की कथा:- जब राजा नहीं होता तो बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।
5. चाणक्य नीति / अर्थशास्त्र 1.19 
    `प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्`  
    अर्थ:- प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है।
6. गरुड़ पुराण - नीति सार  
    सिद्धांत:- अन्याय का मूक दर्शक पाप का 1/4 भागी होता है।
7.  कठोपनिषद 1.3.14 
    `उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत`  
    अर्थ:-उठो, जागो और लक्ष्य तक पहुंचो।

भाग 2: कवियों के वचन - प्रमाण सहित
1. तुलसीदास - रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड दोहा 72  
    `जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥`
2. तुलसीदास - रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड दोहा 97  
    `नृप कुटिल कलि कपटी सामी॥`
3. कबीर दास - कबीर साखी 
    `बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं...`
4. रहीम - रहीम दोहावली 
    `रहिमन राजा एक है, जो सबको दे दान। जो राजा अन्याय करे, सो राजा शैतान॥`
5.  भारतेन्दु हरिश्चंद्र - नाटक "अंधेर नगरी", अंक 1 दृश्य 1,
    `अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥`
6. मैथिलीशरण गुप्त - भारत-भारती, अतीत खंड  
    `हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी।`
7. रामधारी सिंह दिनकर - रश्मिरथी, तृतीय सर्ग 
    `समर शेष है... जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध॥`
8. सूरदास - सूरसागर, विनय के पद 
    `ज्यों गूंगे केरी मिठाई, खाए बिनु स्वाद न आवै॥`

भाग 3: मंच के लिए 4 मुख्य दोहे - याद रखने हेतु*
1.  राजा का धर्म  
    `दण्ड बिना जो राज है, वो डाकू सम जान। छोटी मछली खात है, बड़ी मछली महान॥`
2.  प्रजा का धर्म  
    `चुप रह जो अन्याय को, पापी वही कहाय। पाप का चौथा भाग है, शास्त्रन में समझाय॥`
3. चेतावनी
    `अंधेर नगरी का यही, हाल दिखे संसार। टका सेर अन्याय है, टका सेर दरबार॥`
4.  आह्वान  
    `उठो जागो बोलो अब, समय पुकारे तोय। धर्म बचेगा देश बचे, चुप रहना मत होय॥`

भाग 4: बोलने का तरीका
"जैसा कि--में कहा गया है..."` इस प्रकार स्रोत का नाम लेकर बोलें।  
उदाहरण: _"जैसा कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा..."_

"नारा:"  `जय धर्म! जय सत्य! जय भारत माता की जय!`

तैयार किया गया: धर्म और नीति के अध्ययन हेतु  

कवियों ने इस विषय पर बहुत कठोर और सीधी बात 
कही है !
"जब शासक अन्याय पर मौन हो जाए" - इस पर हिंदी, ब्रज और संस्कृत के कवियों ने चेतावनी दी है।

1. तुलसीदास जी - रामचरितमानस में -
सबसे प्रसिद्ध चौपाई यही है:
 "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।  
सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥"

अर्थ: जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी है, वो राजा निश्चित ही नरक का अधिकारी है।
और भी:
 "बिप्र निरक्षर लोलुप कामी।  
नृप कुटिल कलि कपटी सामी॥"
कलियुग में राजा कुटिल, कपटी और स्वार्थी हो जाएंगे।

2. कबीर दास जी
कबीर ने शासक और समाज दोनों को लताड़ा:-
 "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।  
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥"
मतलब: बड़ा पद पाकर भी अगर प्रजा की रक्षा न करे तो
उस पद का क्या फायदा।

 "काजी मुल्ला भिस्तरा, एकै माला दोय।  
दिल में कपट कुदृष्टि है, ता घर कबहुं न होय॥"
जो अन्याय देखकर भी मौन है, उसके घर धर्म कभी नहीं
आएगा।

3. रहीम जी!
रहीम ने नीति में लिखा:
" रहिमन राजा एक है, जो सबको दे दान।  
जो राजा अन्याय करे, सो राजा शैतान॥" 
 "बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोलें बोल।  
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥"
सच्चा राजा गुण से बड़ा होता है, पद से नहीं।

4. भारतेन्दु हरिश्चंद्र
अंग्रेजों के समय में उन्होंने सीधे कहा:
 " अंधेर नगरी चौपट राजा,  
टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥"
जहां अन्याय का दाम और न्याय का दाम एक हो जाए, 
वो राज्य अंधेर नगरी है।
"भीतर-भीतर सब रस चूसे, बाहर से हितकारी।  
राजा प्रजा को दोनों ठगते, देखें मूक पुजारी॥"

5. मैथिलीशरण गुप्त - भारत-भारती
"हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी।  
आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी॥"
गुप्त जी ने कहा कि जब शासक सो जाए तो प्रजा को जगना पड़ेगा।
  " निज भाषा, निज धर्म की, जो रखता है मान।  
वही सच्चा राजपूत है, वही राष्ट्र की शान॥"

6. रामधारी सिंह दिनकर - रश्मिरथी
दिनकर ने क्रांति की भाषा में कहा:
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।  
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध॥"
अर्थ: अन्याय के समय जो चुप है, वो भी पाप का भागी
है। इतिहास उसे माफ नहीं करेगा।

7. सूरदास - भक्ति के साथ नीति-
"अबिगत गति कछु कहत न आवै।  
ज्यों गूंगे केरी मिठाई, खाए बिनु स्वाद न आवै॥"
अर्थ: अन्याय सहने वाला गूंगे जैसा है। दर्द है पर बोल नहीं सकता।

कवि सुखमंगल सिंह ने कहा-
" ना जो भगवान का  होता ,वह मानव - पुतला होता।" 

" सार: कवियों का एक ही स्वर
कवि-संदेश:
तुलसी: दुखी प्रजा वाला राजा नरकगामी है
कबीर: पद बड़ा हो पर कर्म छोटा हो तो व्यर्थ है
रहीम: अन्यायी राजा = शैतान
भारतेन्दु: अंधेर नगरी = चौपट राजा
दिनकर: तटस्थ रहना भी अपराध है
कवि सुख मंगल सिंह: स्वर्ग नरक की सीढ़ियां चलती
साधन साथ, चुनार जैसा करे तू है सो न वैसा फल पाय।

" कवियों ने एक ही बात कही:" 
राजा का मौन तलवार से ज्यादा घातक है। और प्रजा का मौन उस तलवार को धार देता है।

विषय: "राजा का मौन और प्रजा का जागरण"

(शुरुआत - 20 सेकंड)

आदरणीय अध्यक्ष जी, गुरुजन और मेरे साथियों!  
आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करूंगा जो हमारे
शास्त्रों में हजारों साल पहले लिखा जा चुका है।  
हमारे ऋषि कहते हैं - "राजा राष्ट्र की आत्मा है"  और अगर आत्मा ही रोगी हो जाए तो शरीर कैसे बचेगा।

[पहला दोहा + बात - 20 सेकंड] 

तुलसीदास जी ने बहुत पहले कह दिया था: -
 "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।  
सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥
अर्थात जिस राजा के राज में प्रजा दुखी है, वो राजा नरक का अधिकारी है!
आज अगर चोरी, अन्याय पर शासन मौन है तो समझिए "मत्स्य न्याय" शुरू हो चुका है।

[दूसरा दोहा + उदाहरण - 25 सेकंड]

महाभारत में भीष्म पितामह ने "मत्स्य न्याय" की कथा सुनाई।  
  "दण्ड बिना जो राज है, वो डाकू सम जान। 
  छोटी मछली खात है, बड़ी मछली महान॥" 
जब तालाब का बगुला सो जाता है, तो बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।  
ठीक वैसे ही जब शासक आंख बंद कर लेता है, तो बलवान कमजोर को दबा देता है।

[तीसरा दोहा + चेतावनी - 25 सेकंड]

और सबसे बड़ी बात - हमारा मौन भी पाप है। 
गरुड़ पुराण कहता है और कवि भी यही कहते हैं:
 "चुप रह जो अन्याय को, पापी वही कहाय।  
पाप का चौथा भाग है, शास्त्रन में समझाय॥"

रामधारी सिंह दिनकर जी ने भी कहा - "जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"
कवि सुख मंगल सिंह ने कहा: "पाप छुपाता नहीं, समय देख उतरा जाता"

[समापन + आखिरी दोहा + नारा - 20 सेकंड]

इसलिए साथियों, अब और चुप नहीं रहना है।
" उठो जागो बोलो अब, समय पुकारे तोय। 
धर्म बचेगा देश बचे, चुप रहना मत होय॥"  
आइए हम सब संकल्प लें - अन्याय के खिलाफ आवाज
उठाएंगे।  
बोलिए मेरे साथ - "जय धर्म! जय सत्य! जय भारत माता की जय!" 
[धन्यवाद]
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी,
अवध निवासी अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश ।




Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ