"राह के काँटे"
राह के काँटे ही तो, राह बनाते हैं,
ठोकर खा कर ही तो, पाँव संभलते हैं।
जो फूलों पर चलते हैं, वो अक्सर भटकते हैं,
काँटों पर चलने वाले ही, मंज़िल तक पहुँचते हैं।
मत कोसो इन काँटों को, ये दुश्मन नहीं हैं,
ये तो वो गुरु हैं, जो बिना बोले सिखाते हैं।
हर काँटा कहता है, देख के चलना सीख,
हर ज़ख्म कहता है, अब संभलना सीख।
राह के काँटे न होते, तो एहसास कैसे होता,
कौन अपना है, कौन पराया, ये कैसे पता चलता।
इसलिए जब राह में काँटे बिछे मिलें,
समझना - अब मंज़िल बहुत करीब है।
फूल तो सबने बटोरे, हमने काँटे समेटे,
फूल तो मुरझा गए, काँटे आज भी साथ हैं।
राह के काँटे ही तो, याद दिलाते हैं,
कि पाँव में अभी भी, जान बाकी है।।
मौलिक स्वरचित रचना
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