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रानी दुर्गावती की वीर गाथा

 

रानी दुर्गावती की वीर गाथा

गोंडवाने की धरती काँपी, 

जब शेरनी ने दहाड़ लगाई,
दुर्गावती नाम वो ज्वाला, 

शत्रु देख थर्रा जाए।


विधवा बिंदी माथे सजी,

 पर म्यान में तलवार सजाई,
पुत्र नारायण संग खड़ी,

मातृभूमि को गोद बसाई॥


आसफ खाँ की फौज चढ़ी, 

जबलपुर की घाटी गूँजी,
नर-नारी सब संग चले, 

प्राण न्योछावर करने को।


हाथी पे सवार रानी,

 बिजली सी तन पर छाई,
तीर-कमान लेके निकली,

धरती अम्बर ललकारे॥


सत्तर बरस की उम्र नहीं, 

जिगर में शोला धधका था,
एक-एक वार से मुगलिया,

 लश्कर धूल में मिलता था।


नारी कहकर जो हँसते थे,

 वही रण छोड़ के भागे,
धरती माँ की लाज बचाने, 

रानी ने प्राण त्यागे॥


कट-कट गिरे काफिर माथे,

 खून से नदी बह निकली,

रानी अकेली लड़ती रही, 

जब तक बाँह में बल निकली।


जब तीर लगा जख्मी तन में,

फिर भी झुकी नहीं कमान,
कटारी से सीना चीर दिया, 

ताकि न छू सके बेईमान॥


मिट गई पर मिटी न शान, 

गोंडवाने की ये कहानी,
चूड़ी नहीं पहनी उसने, 

बाँधा कड़ा रणभूमि वाली।


आज भी विंध्य गीत गाते, 

दुर्गा अवतार उतरी थी,
रानी दुर्गावती अमर है, 

भारत माँ की बेटी थी॥

डा।सुखमंगल सिंह वाराणसी 



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