रानी लक्ष्मी बाई
झाँसी की धरती पर बजी थी बांसुरी की तान,
लक्ष्मी बाई नाम सुनते ही उठे थे जवान।
बचपन में खेली तलवार, सीखी रणनीति की बात,
नारी शक्ति का प्रतीक, बन गई वो सौगात।
अंग्रेज़ों के शौर्य को चुनौती देती, बेजोड़,
पिंजरे में बंद नहीं, वह थीं स्वतंत्र की फोड़।
सन् सत्तावन में उठी जब आवाज़ गूँज,
झाँसी का किला बना उनका युद्ध का पुंज।
घोड़े पर सवार, ध्वज लेकर हाथ में,
शत्रु के दिल में खौफ़, उनका बिगड़ा था धाम।
"मैं तो आज़ाद हूँ" गर्जना करती वो,
हर दिल में जगा देती स्वतंत्रता की रो।
अंत में शहीद हुई, पर न भूली जाती कभी,
उनका साहस आज भी गाता इतिहास की ध्वनि।
रानी लक्ष्मी बाई, वीरता की माँ,
भारत माँ की शौर्य गाथा, अनंत प्रेरणा।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी वासी,
अवध निवासी
Sukhmangal Singh
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