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Dr. Srimati Tara Singh
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"पुस्तक समीक्षा: राष्ट्र गीत — डॉ. श्रीमती तारा सिंह"

 
"पुस्तक समीक्षा: राष्ट्र गीत — डॉ. श्रीमती तारा सिंह"

भारत के मानचित्र पर अंकित यह "राष्ट्र गीत" डॉ. श्रीमती तारा सिंह की लेखनी से निकला देशप्रेम का सच्चा उद्गार है। पहली नज़र में ही इसकी पृष्ठभूमि और शब्द मन को बाँध लेते हैं।

"विषयवस्तु और भाव"
गीत का मुखड़ा "करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम" हर अंतरे के बाद दोहराया गया है। यह दोहराव इसे एक प्रार्थना, एक संकल्प और एक नारे का रूप देता है। कवयित्री ने भारत की मिट्टी को "चंदन से कम नहीं" कहकर उसकी पवित्रता स्थापित की है। 

गीत भारत की *विविधता में एकता* को खूबसूरती से समेटता है:
1. *भौगोलिक एकता*: "हम कहीं भी जीयें, हम कहीं भी रहें... भारतीयता का नशा" पंक्ति प्रवासी भारतीयों तक को जोड़ती है।
2. *सांस्कृतिक एकता*: गंगा-यमुना के साथ श्याम के रंग, पत्थर का गाना, पर्वत का पिघलना — ये बिंब भारत की आध्यात्मिक और प्राकृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
3. *धार्मिक समरसता*: "हमें गीता भी प्यारी और बाइबिल भी प्यारा, यहाँ कुरान रहता पुराण संग" — यह पंक्ति गीत का सबसे मजबूत पक्ष है। ये भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बिना किसी उपदेश के, सहजता से कह जाती है।

*भाषा-शैली*
भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और ओजपूर्ण है। कठिन शब्दों से बचते हुए भी कवयित्री ने गहरे भाव जगा दिए हैं। "अतिथि सेवा, न देवता से कम" जैसी पंक्तियाँ 'अतिथि देवो भवः' की संस्कृति को याद दिलाती हैं। टेक की आवृत्ति इसे समूहगान के योग्य बनाती है — स्कूलों, प्रभात फेरियों में गाया जा सकता है।

 "सबल पक्ष"
1. "देशभक्ति का सरल पाठ": बिना आक्रामकता के, प्रेम और गर्व से भरा।
2. "समावेशी दृष्टिकोण": सभी धर्मों, सभी क्षेत्रों को एक सूत्र में पिरोया गया है।
3. "प्रस्तुति": भारत के मानचित्र पर मुद्रित होने से दृश्य प्रभाव भी जुड़ गया है। बच्चा नक्शा देखकर गीत पढ़े तो भूगोल और भाव दोनों जुड़ जाएँगे।

*निष्कर्ष*
यह गीत 21वीं सदी के भारत का राष्ट्रगीत बनने की क्षमता रखता है। इसमें 1947 वाला जोश नहीं, 2026 वाला विवेक है — जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं। डॉ. तारा सिंह ने "भारत माता की जय" को कविता में ढाल दिया है। 

"अनुशंसा": हर भारतीय के घर और हर विद्यालय के प्रार्थना-स्थल पर होना चाहिए।
 डॉ. तारा सिंह जी के मूल भाव को रखते हुए,  लयबद्ध-छंदबद्ध रूप दे रहा हूँ। "ओज-शैली" में, ।

"राष्ट्र गीत : लयबद्ध संस्करण"

करो भारत को नमन, हम भारतवासी हैं हम,  
भारत की माटी चंदन, देवों से बढ़कर है कम॥  
करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम॥

हम कहीं भी जीयें, हम कहीं भी बसें,  
भारतीयता का नशा, कभी भी न उतरे नसें॥  
करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम॥

यहाँ बहती गंगा स्वर्ग की अविरल धार,  
यमुना में खेलता कान्हा, राधा का प्यार॥  
करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम॥

यहाँ पत्थर भी गाएँ, पर्वत भी पिघलें,  
अतिथि सेवा धर्म हमारा, देवता से न कम॥  
करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम॥

हमें गीता भी प्यारी, बाइबिल भी प्यारी,  
कुरान रहे पुराण संग, एकता है न्यारी॥  
करो भारत को नमन, बोलो भारतीय हैं हम॥

विशेष:-
1. "लय":- "करो भारत को नमन" का टेक — समूहगान के लिए उपयुक्त।
2. "परिमार्जन": "श्याम" को "कान्हा" किया, "न उतरे" को शुद्ध किया, "राधा का प्यार" जोड़कर सांस्कृतिक रंग गहरा किया।
3. "भाव वही": विविधता, एकता, श्रद्धा — तीनों अक्षुण्ण रखे।

इसे बच्चों की प्रार्थना-सभा में गवाया जा सकता है। तिरंगे के सामने खड़े होकर जब 50 कंठ एक साथ "करो भारत को नमन" बोलेंगे, तो रोंगटे खड़े हो जाएँ!
- सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 
Sukhmangal Singh



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