पितृ देव हमारी विरासत हैं
विरासत का अर्थ केवल जमीन, मकान या बैंक बैलेंस नहीं है। असली विरासत वह है जो दिखाई नहीं देती, पर हमारे संस्कारों में, हमारे रक्त में, हमारी सोच में जीवित रहती है। हमारे पितृ देव ही हमारी सबसे बड़ी विरासत हैं।
हम आज जो कुछ भी हैं, वह हमारे पितरों के त्याग, तपस्या और परिश्रम का परिणाम है। उन्होंने जो जीवन जिया, जो संघर्ष सहे, जो मूल्य स्थापित किए, वही हमारी जड़ें हैं। जैसे वृक्ष कितना भी ऊँचा क्यों न हो जाए, उसकी मजबूती उसकी जड़ों में होती है, वैसे ही हमारा अस्तित्व हमारे पितरों पर टिका है।
भारतीय संस्कृति में पितरों को देवता माना गया है। श्राद्ध पक्ष केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे पूर्वज अदृश्य रूप में हमारे साथ हैं, हमें देख रहे हैं, हमें आशीर्वाद दे रहे हैं।
आज की चकाचौंध भरी दुनिया में हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी विरासत को भूलते जा रहे हैं। पुराने फोटो एलबम, दादाजी की लाठी, दादी की रसोई की खुशबू, उनके द्वारा कही गई कहावतें - ये सब हमें लगता है कि पुरानी बातें हैं। पर सच तो यह है कि यही हमारी पहचान हैं।
पितृ देव हमें दो विरासत देते हैं। एक है भौतिक - घर, खेत, संस्कार। दूसरी है अभौतिक - ईमानदारी, सहनशीलता, जोड़कर रखने की कला, बड़ों का सम्मान। भौतिक विरासत बंट जाती है, पर अभौतिक विरासत बांटने से बढ़ती है।
जब हम पितरों का सत्कार करते हैं, तर्पण करते हैं, तो हम दरअसल अपने बच्चों को सिखाते हैं कि कल जब हम नहीं होंगे, तो हमारी भी यही कृतज्ञता के साथ याद किया जाएगा। यह एक श्रृंखला है। यह श्रृंखला टूटी तो परिवार बिखर जाता है, समाज बिखर जाता है।
इसलिए पितरों को याद करना अतीत में जीना नहीं है, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करना है। जिस घर में पितरों का सम्मान होता है, उस घर में बरकत होती है, संस्कार होते हैं, और वह घर कभी अनाथ नहीं लगता।
पितृ देव कोई बोझ नहीं, वे हमारी पूंजी हैं, हमारी विरासत हैं, हमारा गौरव हैं।
- सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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