प्रेम परिधि" - एक आलेख
प्रेम एक बिंदु से शुरू होता है और पूरी परिधि बन जाता है।
हम अक्सर सोचते हैं प्रेम सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका के बीच होता है। नहीं। प्रेम की परिधि बहुत बड़ी है।
सबसे छोटा घेरा है - खुद से प्रेम। जो खुद से प्रेम नहीं करता, वो किसी और से क्या करेगा। सुबह उठकर अपने लिए चाय बनाना भी प्रेम है।
दूसरा घेरा है - परिवार से प्रेम। माँ की डाँट में, पिता की चुप्पी में, बहन की लड़ाई में वही प्रेम छिपा है। हम इसे रोज देखते हैं इसलिए पहचान नहीं पाते।
तीसरा घेरा है - मित्रों, प्रकृति, पशुओं से प्रेम। अपने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरना, बरगद के नीचे दो मिनट बैठना, बारिश में भीगना - ये सब प्रेम ही तो है।
और सबसे बड़ा घेरा है - अजनबियों से प्रेम। बस में किसी बुजुर्ग को सीट दे देना, भूखे को रोटी खिला देना। जहाँ स्वार्थ खत्म होता है, वहाँ प्रेम की परिधि अनंत हो जाती है।
समस्या तब होती है जब हम प्रेम को सिर्फ एक घेरे में कैद कर देते हैं। एक लड़के ने धोखा दिया तो लगता है पूरा संसार धोखेबाज है। एक दोस्त ने साथ छोड़ दिया तो लगता है प्रेम झूठ है।
प्रेम झूठ नहीं होता, हमारी परिधि छोटी हो जाती है।
कृष्ण ने कहा था - प्रेम में परिधि नहीं, केंद्र होना चाहिए। केंद्र परमात्मा हो, तो परिधि में पूरा विश्व आ जाता है।
इसलिए प्रेम को नापो मत, फैलाओ। जितना फैलाओगे, उतना ही लौट कर आएगा। यही प्रेम की ज्यामिति है।।
- सुख मगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
Sukhmangal Singh
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