रचना - 1
पितृ देव हमारी विरासत हैं, संस्कारों की थाती हैं,
उनके त्याग तपस्या से ही, जीवन की बगिया भाती है।
अदृश्य होकर भी वो देते, हमको रोज दुआएं हैं,
उनके आशीर्वाद से ही, घर में खुशियां आती हैं।
श्राद्ध नहीं कृतज्ञता है, ये प्रेम का सच्चा बंधन है,
पितरों के चरणों में झुके, यही हमारा वंदन है।
याद करो तो आंसू नहीं, गर्व से सीना तनता है,
पितृ देव के आशीष से ही, हर सपना सजता है।
रचना - 2
जड़ें जो सींच गए हमको, वो पितृ हमारे प्यारे हैं,
उनके ही उपकारों से तो, हम इतने न्यारे हैं।
खून में बहता है उनका, त्याग और बलिदान,
उनकी ही दी शिक्षा से, बनता है इंसान।
दीप जलाकर आज करूं मैं, उनको शत-शत वंदन,
श्रद्धा सुमन अर्पित करता, स्वीकार करो अभिनंदन।
जहां कहीं भी हो आप, सदा खुशहाल रहो,
हम पर कृपा बनाए रखना, सदा दयाल रहो।
रचना - 3 ( भावपूर्ण)
वो चले गए पर छोड़ गए, विरासत में संस्कार,
उनके आशीष से ही चलता, ये जीवन का संसार।
पितृ देव को नमन मेरा, कोटि-कोटि प्रणाम,
उनके ही कर्मों से रोशन, है मेरा नाम।
श्रद्धांजलि नहीं ये है, कृतज्ञता का भाव,
पितरों के बिना अधूरा, है जीवन का हर चाव।।
- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार
वाराणसी
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