पिता की चिंता
पिता की चिंता नहीं, बहू-बेटों की सलामती,
जीवित रहें या मरे, उनकी चिंता नहीं।
बाबुल ध्यान में बैठे हैं, सभी वे जभी मरें,
जमीं तभी विक जाय, उनकी यही परवाह है।
पिता की ममता, बच्चों के लिए नहीं,
जमीन की चिंता, उनकी सबसे बड़ी चिंता।
बेटे-बेटियों की खुशी, उनके लिए नहीं,
जमीन की सुरक्षा, उनकी पहली प्राथमिकता।
पिता की आँखों में, जमीन की तस्वीर,
बच्चों की खुशी, उनके लिए नहीं।
वह जमीन के लिए, सब कुछ न्योछावर,
बच्चों की जरूरतें, उनके लिए नहीं।
पिता की चिंता, जमीन की सुरक्षा,
बच्चों की खुशी, उनके लिए नहीं।
वह जमीन के लिए, जीते हैं और मरते हैं,
बच्चों की जरूरतें, उनके लिए नहीं।
पिता की ममता, जमीन में ही है,
बच्चों की खुशी, उनके लिए नहीं।
वह जमीन के लिए, सब कुछ करते हैं,
बच्चों की जरूरतें, उनके लिए नहीं।
समाज की सच्चाई पर एक कविता:
समाज की सच्चाई, एक दुखद कहानी,
पिता की ममता, जमीन में ही है।
बच्चों की खुशी, उनके लिए नहीं,
जमीन की सुरक्षा, उनकी पहली प्राथमिकता।
समाज में देखा, एक अजीब सी बात,
पिता की चिंता, जमीन की ही रात।
बच्चों की जरूरतें, उनके लिए नहीं,
जमीन की सुरक्षा, उनकी सबसे बड़ी चिंता।
यह समाज की सच्चाई, एक दर्दनाक सच,
पिता की ममता, जमीन में ही है।
बच्चों की खुशी, उनके लिए नहीं,
जमीन की सुरक्षा, उनकी पहली प्राथमिकता।
समाज को बदलने की जरूरत है,
पिता की ममता, बच्चों में भी बंटनी चाहिए।
जमीन की सुरक्षा, एक तरफ,
बच्चों की खुशी, भी महत्वपूर्ण है।
समाज की सच्चाई को बदलने की जरूरत है,
पिता की ममता, बच्चों के लिए भी होनी चाहिए।
सुख मंगल सिंह
कुलाधिपति काशी हिंदी विद्यापीठ
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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