"पितरों का सत्कार"( दोहा)
पितरों का सत्कार ही, सच्चा है त्योहार।
इनके आशीष से सदा, चलता है परिवार।।
पितरों का सत्कार जहाँ, होता बारंबार।
उस आँगन में ही बसें, खुशियाँ और बहार।।
श्राद्ध पक्ष में आ रहे, पितर बन मेहमान।
पितरों का सत्कार कर, रखो कुल की शान।।
धूप दीप और तर्पण से, पितरों का सत्कार।
करते जो श्रद्धा सहित, पाते हैं सत्कार।।
सुख मंगल सिंह 'मंगल' ने, दिया नेक विचार।
पितरों का सत्कार ही, संस्कृति का आधार।।
- सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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