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"135 किलोमीटर की आस्था"

 

           "135 किलोमीटर की आस्था"  
अहिरौली रानी, मऊ से अयोध्या तक की एक सच्ची सी कहानी

        "पैदल अयोध्या" 

अंबेडकर नगर 'वर्तमान'तत्कालीन फैजाबाद जिले के आखिरी छोर पर बसा है गाँव — "अहिरौली रानी मऊ" ।  
आज गाड़ी, ट्रेन, बस सब है। पर 40-50 साल पहले यहाँ के लोगों के लिए अयोध्या जाना मतलब था -"पैदल यात्रा" ।

गाँव में ठाकुर दीनदयाल चाचा सबसे बुजुर्ग थे। हर साल कार्तिक महीने में वो एक टोली बनाते। हाथ में लाठी, कंधे पर गमछे में कपड़ा, पोटली में चना-गुड़ और मिट्टी की सुराही।

"चलो भैया, राम जी बुला रहे हैं" - यही एक आवाज होती और 20-25 लोग जुट जाते। औरतें, बूढ़े, जवान सब।

"135 किलोमीटर का सफर:-"  
रास्ता सीधा नहीं था। अहिरौली रानी मऊ → जहांगीरगंज → बसखारी → गोसाईगंज→ फैजाबाद → अयोध्या।  
रोज 15-20 किलोमीटर। सुबह तड़के निकलते, दोपहर किसी पीपल के नीचे सुस्ताते, रात किसी मंदिर के बरामदे में। सड़क नहीं थी पगडंडी रास्ता था । इट पत्थर बिखरे हुए रहते थे।

लोग पूछते — "चाचा, ट्रेन से क्यों नहीं जाते?"  
'उसे समय ट्रेन अकबरपुर से फैजाबाद  तक चलती थी।'
वो हँस कर कहते — "बेटा, पैदल जाने में हर कदम पर राम का नाम जप होता है। थकान में भी भजन है। ट्रेन में तो बस बैठे-बैठे पहुँच जाओगे, पुण्य कहाँ मिलेगा?"

रास्ते में जो भी मिलता, पानी पिलाता, रोटी दे देता। अवध की मिट्टी में यही तो संस्कार है। एक बार बाढ़ आ गई थी। सरयू का पानी चढ़ा हुआ था। सब डर गए। दीनदयाल चाचा ने सरयू को प्रणाम किया और बोले — "मैया, हम तेरे राम से मिलने जा रहे हैं। रास्ता दे।"  
और पानी सच में थोड़ा उतर गया। सब पार हो गए। जगह-जगह छोटी बड़ी नदियां, तालाब पोखर भरे हए थे।

 "अयोध्या पहुँच कर"  
10-12 दिन बाद जब राम की पैड़ी दिखती, तो सबकी आँखें भर आतीं। थकान एक पल में गायब। पहले डुबकी, फिर हनुमानगढ़ी, फिर रामलला।  
कहा जाता है कि" हनुमान जी से आज्ञा लेकर ही रामलाल का दर्शन करना चाहिए !"
वहाँ 3 दिन रुकते। रामकथा सुनते, प्रसाद बाँटते, और वापस उसी रास्ते।

लौटते समय सबके हाथ में सरयू का जल और रामलला का प्रसाद होता। अयोध्या राम जन्म भूमि का प्रसाद पूरे  गाँव में बाँटते।

संदेश:-  
एक बार एक लड़का बोला — "चाचा, अब तो बस आ गई है, 6 घंटे में पहुँचा देती है।"  
चाचा बोले — "बेटा, मंजिल 6 घंटे में पहुँच जाएगी। पर 135 किलोमीटर में जो धीरज, भरोसा और रामनाम सीखा जाता है ना, वो बस में नहीं मिलेगा।"

आज दीनदयाल चाचा नहीं हैं। पर अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के नौजवान अब भी हर साल कार्तिक में 2-4 लोग पैदल जाते हैं। नाम बदलकर कभी "राम पदयात्रा संघ" रख दिया है।

" क्योंकि कुछ यात्राएँ पैरों से नहीं, श्रद्धा से तय होती हैं।" 

जय श्री राम। जय सरयू मैया

अहिरौली रानी  मऊ से अयोध्या की ये पदयात्रा बताती है कि आस्था के आगे दूरी मायने नहीं रखती।
- सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
वाराणसी 


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