साहित्यकार माखनलाल चतुर्वेदी जी के जन्मोत्सव 4 अप्रैल पर रचना विशेष:-
मुझे तोड़ देना वन माली, मुझे पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक
मैं बन जाऊं एक पत्थर, जिस पर पड़ें पैर वीरों के
मैं बन जाऊं एक दीपक, जिसकी रोशनी में चमकें वीर।
मैं बन जाऊं एक नदी, जिसकी लहरें बहें आशा की
मैं बन जाऊं एक फूल, जिसकी खुशबू से महकें वीर
मैं बन जाऊं एक पहाड़, जिस पर चढ़ें वीरों के कदम
मैं बन जाऊं एक तारा, जिसकी रोशनी में चमकें वीर।
मुझे तोड़ देना वन माली, मुझे पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक
मैं बन जाऊं एक शस्त्र, जिसकी धार से कटें शत्रु
मैं बन जाऊं एक शक्ति, जिसकी गरज से डरें शत्रु।
मुझे तोड़ देना वन माली, मुझे पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक
मैं बन जाऊं एक ज्योति, जिसकी रोशनी में चमकें वीर
मैं बन जाऊं एक शक्ति, जिसकी गरज से डरें शत्रु।
मैं बन जाऊं एक नदी, जिसकी लहरें बहें देशभक्ति की
मैं बन जाऊं एक पहाड़, जिस पर चढ़ें वीरों के कदम
मैं बन जाऊं एक तारा, जिसकी रोशनी में चमकें वीर
मैं बन जाऊं एक शस्त्र, जिसकी धार से कटें शत्रु।
मुझे तोड़ देना वन माली, मुझे पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक
मैं बन जाऊं एक आवाज, जिसकी गूंज से जागें वीर
मैं बन जाऊं एक विचार, जिसकी प्रेरणा से चलें वीर।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
Sukhmangal Singh
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