"ओडिशा यात्रा" - सुखमंगल सिंह, लघुकथा । इसमें मिशन, संघर्ष और देशभक्ति का जो संगम है वो बहुत सुंदर है।
ओडिशा यात्रा
सुखमंगल सिंह
यात्राएं सतयुग के समान होती हैं और चलना जीवन है। अतएव देशाटन के निमित्त यात्रा महत्वपूर्ण है। मानव को संसार बंधन से छुटकारा पाने हेतु जल-तीर्थ की यात्रा करना चाहिए।
" सुखमंगल सिंह":
_yatraen hamesha gyan-urja vriddhi mein sahayak hoti hain_
कवि अजीत श्रीवास्तव:
गाड़ी तीन घंटे विलम्ब से चल रही थी, जिसकी सूचना रेल प्रसारण यंत्र से की गई। साथ में दो लोगों के रहने से राह बोझिल नहीं हुई। फिर क्या था कि दस बजे सूचना प्रसारित हुई कि रेलगाड़ी दो घंटे और विलम्ब से है।
चाह यह नहीं कि सिर्फ मेरा नाम पहुँचे,
चाह यह कि पूरे विश्व में हिंदी का सलाम पहुँचे।
यही हमारा मिशन है। इस मिशन में कठिनाइयों की चर्चा के लिए कोई स्थान नहीं है।
उड़ीसा के लोग बड़े प्यारे हैं। मैं सन 2015 में भी गया था, सपत्नीक। श्री जगन्नाथपुरी और ढेंकानाल तक।
उड़ीसा संपर्क क्रांति रात्रि 12:30 बजे मुगलसराय आई। एस-5 में लोअर बर्थ 9 और 12 पहले से ही आरक्षित थे। हम दोनों बैठ गए।
घर से दिव्य मकुनी बाटी बनवाकर सफर के लिए रख रखा था। हम दोनों ने उसे खाया, एक गुड़ खाकर पानी जमकर पिया। खैनी जमी। कुछ बातें हुईं और नींद लगने लगी। हम दोनों अपने-अपने बर्थ पर सो गए।
रात्रि के तीन-सवा तीन के लगभग बीच में जाग गया था। उसी समय फ्रेश हो लिया था। फिर लेटा तो नींद लगी और खुली 8:30 बजे सुबह। देखा मित्र यात्री कवि अजीत श्रीवास्तव डायरी में कुछ लिख रहे थे। शायद उस फेसबुक से संबंधित, जिस रचना को मेरे मोबाइल से देखा था। लिखा था -
"मैं समस्या देता हूँ, समाधान नहीं। मुझसे बढ़के कोई इंसान नहीं।"
देखकर उस समय मित्र मुस्कराए। कुछ बोले नहीं।
"चाय... चाय... गरम चाय!" चाय वाला आया। हम दोनों ने चाय पी। खैनी जमी।
यात्री संगी ने कहा - "सुखमंगल जी, कुछ लोगों ने फेसबुक को बंदर के हाथ अस्तुरा समझ लिया है।" और एक कागज पर लिखकर मुझे दिया -
"जो समस्या देते हैं, समाधान नहीं।
ऐसों से बढ़के, कोई शैतान नहीं।
कविता करना, एक तपस्या है।
कविता, कविता है परचून की दुकान नहीं।"
हिंदी के लिए प्रचार-प्रसार की सबसे अधिक जरूरत यदि कहीं है तो वह है अहिन्दी भाषी क्षेत्र में। इसी उद्देश्य को मिशन के तहत अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के भीतरी इलाकों में पहुँचकर हिंदी की अलख जगाने का कार्य विगत दो वर्षों से कर रहा हूँ। जो हिंदी आज विश्व फलक पर नंबर दो पर है, उसे नंबर एक का दर्जा दिलाने में यह मिशन सफल होगा, यही आशा है।
इस मिशन में अखिल भारतीय सद्भावना एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखमंगल सिंह और कार्यकारी महासचिव अजीत श्रीवास्तव लगे हैं।
ढेंकानाल (उड़ीसा) प्रधान महाप्रबंधक, दूरसंचार कार्यालय के हिंदी पखवाड़ा-2017 में हम दोनों को आमंत्रण मिला। मुझे मुख्य वक्ता और अजीत श्रीवास्तव को सम्मानित अतिथि के रूप में काव्यपाठ करने हेतु।
सितम्बर 12, 2017 को हम पहुँचे मुगलसराय जं. सायं 6 बजे। संपर्क क्रांति एक्सप्रेस का समय 7:30 का रहा।
ट्रेन टाटानगर पहुँची। आधा घंटे रुकी और फिर अपने गंतव्य को चल दी। दोनों बोतलें जो खाली हो चली थीं, उनमें पानी की व्यवस्था हमने टाटानगर में कर ली। स्टेशन पर कुछ गमले दिखे, बचा हुआ पानी उन्हीं गमलों में उड़ेल दिया। दो-दो मकुनी बाटी, नींबू के अचार के साथ खाया गया। गुड़ खाने के बाद पानी पेट भर पिया। एक-एक चाय के बाद खैनी जमी।
सफर में चर्चाएँ खूब होती हैं। लोगों की चर्चा आरक्षण पर केंद्रित थी। सभी के मुखर स्वर आरक्षण को आर्थिक आधार पर दिए जाने के पक्ष में रहे।
राजनीति ने सत्तर सालों में कुछ ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। पर ट्रेन में ऐसा कुछ नहीं रहा।
- सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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