Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"मुगलसराय की एक रात"

 


उपन्यास: "मुगलसराय की एक रात"
अगला भाग


रात के 11 बजे के बाद कमरे में सन्नाटा था।  
छत का पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था और बाहर सावन की बूंदें टिन पर टप-टप कर रही थीं।

नमक दूसरे पलंग पर पीठ करके लेटा था। उसकी सांसें बता रही थीं कि वो जाग रहा है, पर आंखें बंद किए हुए था।  
उसके मन में दिन भर डॉक्टर का कहा वाक्य गूंज रहा था        "बच्चा होना मुश्किल है।" 
शायद इसी वजह से आज वो चुप था। ज्यादा बोलता तो सवाल खड़े होते।


विवेक का मुंह दीवार की तरफ था। पर उसकी हर सांस माला की तरफ खिंची जा रही थी।  
पुराने रिश्ते राख में दबे अंगारे जैसे होते हैं। हवा का एक झोंका काफी है।

माला बीच वाले पलंग पर करवट बदल रही थी। नींद किसी को नहीं आ रही थी।  
आखिर उसने बहुत धीमी आवाज में कहा — "पानी..."  
विवेक उठा, गिलास भरकर दिया। हाथ लगते ही दोनों का दिल एक बार फिर धड़क गया।

बातें शुरू हुईं। पहले हाल-चाल, फिर पुरानी यादें।  
"तुम अब भी वैसे ही हंसती हो" — विवेक ने कहा।  
"और तुम अब भी वैसे ही रूठ जाते हो" — माला मुस्कुरा दी।

नमक सब सुन रहा था। पर उसने आंख नहीं खोली। उसके अंदर अजीब सी शांति थी।  
वो सोच रहा था — _घर का नाम, खानदान का नाम तो मेरा ही रहेगा। हाथी घूमे गांव-गांव, जिसकी हाथी उसका नाम।_  
इस सोच ने उसे एक अजीब तसल्ली दे दी थी।

रात धीरे-धीरे बातों में, चुटकुलों में और पुराने लम्हों की यादों में निकल गई।  
कभी माला हंस देती, कभी विवेक उसकी बात पर सिर हिला देता।  
शब्दों में प्रेम था, आंखों में अपनापन था, और बीच में एक खामोश समझौता भी था।

सुबह 5 बजे अजान की आवाज आई। तीनों उठे।  
माला ने चाय बनाई। नमक नहाकर ड्यूटी के लिए निकल गया। जाते-जाते उसने बस इतना कहा — "ख्याल रखना।"

नमक के जाने के बाद कमरा फिर खाली हो गया।  
विवेक और माला छत पर आ गए। सरयू की तरफ से ठंडी हवा आ रही थी।

"फिर मिलेंगे?" विवेक ने पूछा।  
"मिलना तो पड़ेगा" माला ने कहा और हल्के से हंस दी — "वरना ये सावन अधूरा रह जाएगा।"

विवेक ने वादा किया। फिर बैग उठाया और सीढ़ियां उतर गया।

नीचे मुगलसराय स्टेशन की भीड़ में वो खो गया।  
पीछे माला दरवाजे पर खड़ी रही, जब तक उसका कुर्ता भीड़ में ओझल नहीं हो गया।

नमक ड्यूटी पर था, पर आज उसके चेहरे पर पहली बार एक अजीब सुकून था।  
शायद उसे लग रहा था कि उसने सब कुछ पा लिया — घर भी, नाम भी।

और माला... माला के दिल में दो नाम थे।  
एक नाम जिम्मेदारी का, दूसरा नाम धड़कन का।

भाव:-
ये रात किसी के लिए समझौता थी, किसी के लिए राहत, किसी के लिए पुराने प्रेम की वापसी।  
मुगलसराय का वो एक कमरा, तीन जिंदगियों की दिशा बदल गया।

आगे का भाग -जब विवेक और माला की अगली मुलाकात होती है और नमक को धीरे-धीरे सच्चाई की भनक लगती है?

उपन्यास: "मुगलसराय की एक रात"  
अगला भाग - "लहुराबीर का कमरा"

मुगलसराय वाली रात के बाद तीनों के बीच एक अनकहा समझौता बन गया था।  
बातें कम हुईं, पर आंखों की भाषा तेज हो गई।

15 दिन बाद नमक को ड्यूटी के सिलसिले में लहुराबीर जाना पड़ा।  
उसने खुद कहा — "विवेक, चलो तुम्हारे किराए के कमरे पर ही रुकते हैं। पास भी पड़ेगा।"

विवेक के सीने में धड़कन तेज हो गई। माला भी साथ थी।  
तीनों एक बार फिर एक छत के नीचे थे। फर्क बस इतना था कि अब ये कमरा विवेक का था।

रात का खाना साथ खाया। नमक थक कर जल्दी सो गया।  
विवेक और माला छत पर गए। लहुराबीर की गलियों में दूर कहीं रेडियो पर पुराना गीत बज रहा था।

"डर नहीं लगता?" विवेक ने पूछा।  
"डर तो उसी दिन मर गया था" माला बोली — "जब तुमने पानी का गिलास दिया था।"

उस रात बातें फिर पुराने दिनों में लौट गईं।  
हंसी थी, चुटकुले थे, और बीच-बीच में लम्बी खामोशी।  
खामोशी जिसमें दोनों एक दूसरे को बिना शब्दों के पढ़ रहे थे।

सुबह नमक ड्यूटी चला गया।  
जाते-जाते उसने माला से कहा — "आज यहीं रुक जाना। विवेक अकेला है, खाना बना देना। शाम को मैं ले जाऊंगा।"

नमक को लगा वो बहुत बड़ा काम कर रहा है।  
उसके मन में बस एक ही प्रार्थना थी — _मेरी माला की गोद एक दिन जरूर भरेगी। किलकारियां सुनूंगा तो सारी दुनिया भूल जाऊंगा।_

नमक के जाने के बाद कमरा बदल गया।  
अब कोई तीसरा नहीं था।

पहले दिन माला जल्दी वापस आ गई।  
दूसरी बार वो रुकी।  
तीसरी बार वो खुद चली आई।

धीरे-धीरे "कभी-कभी" की जगह "आदत" ने ले ली।  
लहुराबीर के उस छोटे किराए के कमरे में अब दो जिंदगियां एक धुन पर चलने लगीं।

बातें अब सिर्फ पुरानी यादें नहीं रहीं।  
अब इजहार होने लगा।  
"तुम्हारे बिना दिन भारी लगता है"  
"तुम्हारी हंसी के बिना चाय फीकी लगती है"

विवेक माला के लिए चूड़ियां लाया।  
माला विवेक की शर्ट पर बटन टांकती।  
छोटी-छोटी बातों में प्रेम पलता गया।

नमक को जब भी फोन करता, सबसे पहले पूछता — "माला कैसी है?"  
और फोन के उस पार से माला के हंसने की आवाज सुनकर वो सुकून से कहता —  
"देखना, एक दिन हमारे घर में भी बच्चे की किलकारी गूंजेगी।"

नमक को नहीं पता था कि वो जिस खुशी का इंतजार कर रहा है,  
उस खुशी की नींव उसके अपने हाथों से रखी जा रही है।

माला के दिल में अब दो घर थे।  
एक घर कागज पर नमक के नाम,  
दूसरा घर धड़कन में विवेक के नाम।

और विवेक...  
वो अब सिर्फ पुराना प्रेमी नहीं था।  
वो माला का वर्तमान बन चुका था।

भाव:- 
लहुराबीर का वो कमरा गवाह बन गया।  
एक तरफ नमक का भोला विश्वास था, दूसरी तरफ माला और विवेक का बढ़ता हुआ प्यार।  
समय ने तीनों को एक ऐसी डोर में बांध दिया था, जिसे अब कोई भी अकेले नहीं तोड़ सकता था।

जब मोहल्ले में कानाफूसी शुरू होती है और नमक को पहली बार शक होता है?

- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत!

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