"मिट्टी का मटका"
कुम्हार के हाथों में घूमता चाक देखा,
मिट्टी में भी हमने भविष्य देखा।
न बिजली, न बिल, न कोई शोर है,
मटके का पानी तो अनमोल है।
फ्रिज की ठंडक गला पकड़ती है,
मटके की ठंडक जान में बसती है।
पीएच बैलेंस रखे, अमृत जैसा,
धूल-मिट्टी को भीतर नहीं आने देता।
धरती से निकला, धरती में मिल जाएगा,
प्लास्टिक नहीं जो ज़हर फैलाएगा।
कुम्हार के घर का चूल्हा जलता है,
इससे एक परिवार पलता है।
मिट्टी की खुशबू, देश की खुशबू,
इसमें बसी है माँ की ही खुशबू।
छोड़ो बोतल का वो दिखावा,
मटका अपनाओ, यही है देसी दवा।।
- सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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