"मेरी माँ"
मेरी माँ चुपचाप दीया-सी जलती रही उम्र भर
अपनी नींद बुझा कर हमको देती रही सहर।
रोटी की परतों में छुपा दिए उसने त्योहार
फटी चुनरिया ओढ़ के हमको दिए नए उपहार।
डाँट में उसकी तुलसी-सी महक हमेशा पाई
लोरी में गंगा-सी बहती ममता की गहराई ।
थका हुआ जब लौटा मैं, द्वार पर मिलती छाँव
उसकी हथेली छूते ही मिट जाते सब घाव ।
बाबूजी के जाने पर भी टूटी नहीं कभी
बेटों की खातिर पी गई सब आँसू अपने सभी ।
बूढ़ी आँखों में अब भी मेरा बचपन पलता है
मेरे माथे की सलवट पढ़कर वो मचलता है ।
मंदिर नहीं, माँ के चरणों में ही स्वर्ग मिला
उसकी ममता के आगे हर वरदान हिला ।
ईश्वर से अब क्या माँगूँ, जब माँ साथ खड़ी
सोलह लाइन क्या, मेरी पूरी उम्र उसे पड़ी।।
- सुखमंगल सिंह, वाराणसी
Sukhmangal Singh
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