Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मेरी खुशी में साथ रहकर हमसफ़र मेरा चला

 

मेरी खुशी में साथ रहकर हमसफ़र मेरा चला,  
आज ग़म के दौर में वह यार क्यों है लापता।

धूप में साए की सूरत साथ-साथ जो दिया,  
अब के बरसातों में वह दीवार क्यों है लापता।

वादियों में हँस के कहता था 'तुम्हीं तो घर हो मेरा',  
शहर-ए-तन्हाई में अब ऐतबार क्यों है लापता।

जश्न की हर थाल में जो नाम सबसे पहले था,  
आँसुओं की भीड़ में वह नामदार क्यों है लापता।

मैंने माना वक़्त बदला, लोग बदलते हैं मगर,  
दिल के रिश्तों का मगर किरदार क्यों है लापता।

'हम' से 'मैं' तक का सफ़र जो तय किया तन्हा किया,  
रास्ते में छोड़ आया जो दयार, क्यों है लापता।

हर खुशी में तालियाँ थीं, अब सदा तक ख़त्म है,  
'दोस्त' कहने वाला मेरा मनुहार क्यों है लापता।।

- सुख मंगल सिंह
 वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
  वाराणसी 


Sukhmangal Singh

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