Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"मेरी काव्य-साधना"

 
"मेरी काव्य-साधना"

1. सद्भावना

ले अछूतों को गले लगा, हिन्दुओं, वीर जगा,
वर्ना ये लाल, गैरों के घर जायेंगे।
टूट जाये ना माला कहीं, प्रेम की,
कीमती ये रतन हैं, बिखर जायेंगे।।

2. सावन आयो वसंत
    (कजरी - शृंगार गीत)

नैहर आओ, बीते बरस, कामदेव को तड़पाने,
सावन-भादो लुक-छिप आये, कजली संग-संग गाने।।

धानी चुनरी, बावरी बदली, मोती जस टपकाने,
नव श्रृंगार झरने अपार, बाण चला के फँसाने।।

पाँव में पायल, कड़ा, करधनी, छम-छम धूम मचाने,
चमक-दमक के बिजली चमकत, सखियन को हरषाने।।

क्षण-क्षण आहे, भितरी रातें, हरिनी को फँसाने,
ठाँव-ठाँव, पग-पग बैठे बट, राहें हैं अनजाने।।

अदल-बदल, नव परिभाषायें, लाली लहरै नये जमाने,
मन मुरली धुन सुन, गुन बिहरै, राधा नाचहि मनमाने।।

मंगल मनमोहन, मचल चली बिजली, झरने छन-छन झंकाने,
नवल नवेली सरिता, सूखी केशराशि घन, मधुरस बरसाने।।

कुनबे कुंज-कुंज, मधुर गंज सरसै, रसिक रंगीले,
चपला चमकै, धुनि छकि-छकि हरसै, छैल छबीले।।

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
 वाराणसी 



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