Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"महँगाई" आलेख की समीक्षा

 
*"महँगाई" आलेख की समीक्षा*  
_लेखिका: डॉ. श्रीमती तारा सिंह, नवी मुम्बई_  
_स्रोत: DR. TARA SINGH SPECIAL EDITION, स्वर्गविभा, पृ. 36-37_

*1. विषय और प्रासंगिकता: 10/10* 
आजादी के 66 साल बाद भी महँगाई आम आदमी का सबसे बड़ा दर्द है। लेखिका ने संभवत : 2013-14 के दौर की महँगाई — प्याज ₹100/किलो, दाल-रोटी का दुर्लभ होना — को आधार बनाकर लिखा है। 2025 में भी मुद्दा उतना ही ज्वलंत है। इसलिए आलेख की प्रासंगिकता कालजयी है।

*2. भाषा-शैली: 9/10* 
*ताकत*: भाषा तीखी, व्यंग्यात्मक और जनपदीय है। _"महँगाई घने वट-वृक्ष का रूप ले चुकी है, जिसका पत्ता-पत्ता विषैला है"_ या _"इन्सान की जान अभी तक सस्ती है; इतनी सस्ती कि सौ-दो सौ में भी बिक जाती है"_ — ये पंक्तियाँ सीधे दिल पर वार करती हैं। मुहावरे _"ढाक के तीन पात"_, _"आकाश कुसुम"_ का सटीक प्रयोग है।
*3. तर्क और विश्लेषण: 8.5/10* 
लेखिका ने महँगाई के बहुआयामी कारण गिनाए हैं: 
- *मानवीय*: जमाखोरी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, नेताओं के गैर-जिम्मेदार बयान
- *नीतिगत*: दोषपूर्ण वितरण, योजनाओं में तालमेल की कमी, कर-वृद्धि  
- *बाहरी*: तेल के दाम, प्राकृतिक आपदा

_"एक ओर महँगाई आम लोगों के बच्चे तक बेचने को विवश करती है, दूसरी तरफ नए धनाढ्य पैदा करती है"_ — यह वर्गीय विषमता का सटीक चित्रण है। 

*4. समाधान की व्यावहारिकता: 8/10* 
सुझाव ठोस हैं: 
1. *जनसंख्या नियंत्रण कानून* + दो बच्चे वालों को प्रोत्साहन
2. *जमाखोरी पर सख्त सजा* + ईमानदार निगरानी तंत्र
3. *उपभोक्ता आंदोलन* से अफवाहों पर रोक
4. *राजनीतिक स्थिरता* और संतुलित दृष्टिकोण
*5. भावनात्मक प्रभाव: 9.5/10* 
आलेख गुस्सा, दर्द और व्यंग्य का मिश्रण है। _"यह मौत का काढ़ा है, पीते नहीं बनता और बिना पीये, जीते भी नहीं बनता"_ — आम आदमी की लाचारी को बखूबी उकेरती है। पाठक खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है।

*समग्र मूल्यांकन: 9/10*

*खूबियाँ*:
1. *जन-सरोकार*: औसत आदमी की पीड़ा केंद्र में है। 
2. *बेबाकी*: सरकार, व्यापारी, नेता — किसी को नहीं बख्शा।
3. *व्यंग्य की धार*: "चंद्रमा पर महल बनवाने जा रहे हैं" जैसी पंक्तियाँ असरदार हैं।
4. *समग्र दृष्टि*: कारण से समाधान तक पूरी श्रृंखला छूती है।
*निष्कर्ष* 
डॉ. तारा सिंह का यह आलेख महँगाई पर सिर्फ रुदन नहीं, एक सामाजिक दस्तावेज है। यह बताता है कि महँगाई सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक और राजनीतिक बीमारी भी है। भाषा की आग और तर्क की स्पष्टता इसे अखबारी लेख से ऊपर उठाकर साहित्यिक निबंध बना देती है। 

आज जब फिर से टमाटर-प्याज रुला रहे हैं, यह आलेख आईना दिखाता है — *"दिखावे की योजनाओं से नहीं, ईमानदार नीति और नीयत से ही महँगाई मरेगी।"*

*किसके लिए पढ़ें*: नीति-निर्माता, अर्थशास्त्र के छात्र, और हर वो व्यक्ति जो बाजार से खाली थैला लेकर लौटता है।

- डॉ सुखमंगल सिंह, 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 
sukhmangal@gmail.com



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