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"माया और मोहब्बत के बीच"

 
 "सामाजिक, संदेश परक और ज्ञानवर्धक लघु कथा"  तैयार की है। नाम और कुछ शब्दों को सम्मान के साथ थोड़ा साहित्यिक रूप दिया है।

"माया और मोहब्बत के बीच"  
  
-लेखक: सुख मंगल सिंह

गाजीपुर जनपद के "दिलदारनगर"  क्षेत्र में कवि "वहशी राम"  का घर है। अगस्त की 13 तारीख थी। 15 अगस्त से पहले "वंदे भारत कवि सम्मेलन" का आयोजन रखा गया था।

वहशी राम ने पत्नी से सुबह ही कह दिया था - "आज 5-6 लोग शाम को घर पर भोजन करेंगे। चावल-दाल-रोटी-सब्जी और सलाद बना देना।"

सम्मेलन अच्छा हुआ। मंच पर कविता, देशभक्ति और तालियों की गूंज थी। दूसरे जिले से लगभग एक दर्जन कवि आए थे - कोई पडरौना से, कोई वाराणसी, रामनगर, इलाहाबाद और बिहार के भभुआ से। 5बजे शाम कार्यक्रम खत्म होते-होते सब अपने-अपने रास्ते चले गए। ट्रेन, बस पकड़ ली।

शाम को सिर्फ दो मित्र रुक गए। एक " कवि राम लखन"  और दूसरे "कवि लकडू राम"।

1. मेहमाननवाजी की कसौटी:
रात 6 बजे वहशी राम के छोटे बेटे ने दरवाजे पर आकर कहा - अंकल जी चाय बनवा दें चाय पियेंगे?
अंकल जी, चाय बनवा दीजिए।"  अच्छा तो हो रही है काफी थक चुके हैं 130 किलोमीटर गाड़ी चलाकर वाराणसी से आया हूं, और कल शाम को अंबेडकर नगर जनपद से गाड़ी चला कर 140 किलोमीटर का सफर टाइम किया था । शरीर बहुत थकी हुई है! 
कवि वहशी राम के छोटे बेटे ने चाय पीने के लिए तो कहा परंतु रात के 9:45 बजे तक चाय का कहीं पता ठिकाना नहीं था।
वहशी राम ने पत्नी से कहा, पर घर की रसोई में सन्नाटा था। पत्नी नाराज थीं। उनका मानना था - "कवि सम्मेलन से पेट नहीं भरता, घर की माया भी देखनी चाहिए।"

1 घंटे बाद पत्नी पोर्च में आईं। हाथ में थोड़ा मीठा और पानी। चाय नहीं।  
रात 9:45 बजे वहशी राम  डांट-फटकार के बाद चाय बनवा पाए। साथ में दिन का बचा हुआ खाना परोसा गया। प्याज की गंध आ रही थी।

कवि लकडू राम ने खाना नहीं खाया। आधा गिलास दूध पीकर चारपाई पर लेट गए। चारपाई पर बिस्तर नहीं था।  
कवि राम लखन बोले - "मेरे तखत में गड्ढा पड़ा है, उसे बिछा लो। मैं तखत पर ही हूं मैं सो जाऊंगा।"

10:15 पर बासी राम की पत्नी लखपति देवी खाना लेकर आती है और वह खाना कवि वहशी राम कवि राम लखन के लिए। कवि लकङू राम के बारे में उन्होंने सोचा भी नहीं यह देखकर वहशी  राम ने अपनी पत्नी को डांटा फटकार लगाया और कहा कवि लकङू राम को एक गिलास दूध दे दो।

रात 10:30 बजे वहशी राम दोनों को लेकर ऊपर कमरे में ले गए। खुद बेड पर सुलाया और स्वयं नीचे चटाई बिछाकर सो गए। कवि वहशी  राम जब ले जा रहे थे ऊपर कमरे में तो उनके साथ केवल लकडू राम पहले गए बाद में कवि राम लखन जिनके हाथ में एक सोटा था लेकर चढ़ने लगे तो कवि वहशी राम की बहू छोटी बहू ने कहा की देखिए सबको लेकर छत पर जा रहे हैं ऊपर कमरे में ।

नीचे के कमरे में बहुत गर्म थी पंखा बहुत धीरे-धीरे चल रहा था उसका कंडेनसर खराब था मच्छर भी लग रहे थे ना बिस्तर न मच्छरदानी ना मच्छरों को भगाने वाली  अगरबत्ती बड़ा कष्ट था अतिथियों को!
 

रात 11 बजे पत्नी ऊपर आईं। धीमी आवाज में बोलीं - "आप नीचे क्यों सो रहे हैं?" आवाज में शिकायत थी, आँसू भी।  
वहशी राम चुप रहे। उन्होंने जीवन में कभी "माया" को नहीं बाँधा। उनका काम था - गाय का गोबर उठाना, आंगन लीपना, शब्द बोना।

2. सुबह का सफर और सीख:
भोर 4 बजे तीनों उठे। बनारस जाना था। न चाय, न पानी। तीनों निकल पड़े। आगे बाजार में चाय पी और आगे बढ़ गए।
३- जाते समय;
रास्ते में सैयदराजा के पास गाड़ी का टायर पंचर हो गया। साथ में बैठे एक प्रोफेसर भी थे। तीनों ने मिलकर स्टेपनी लगाई और चल दिए।
4- वापस आते समय;
कैथी, मारकंडेय महादेव से 3 किमी पहले वही स्टेपनी वाला टायर फिर बैठ गया। सुबह 7:30 बज चुके थे।  
वहशी राम और राम लखन गाड़ी छोड़कर नदेसर गए। दुकान डेढ़ घंटे बाद खुली। नाश्ता किया, पानी पिया, टायर बनवाया।  
दोपहर 12:30 बजे टोटो से वापस आकर टायर बदला।

लकडू राम गाड़ी में इंतजार कर रहे थे। उन्हें खुश करने के लिए वहशी राम और राम लखन 2 कोल्ड ड्रिंक, 2 पानी की बोतल कुल 200 रुपये का दही-बड़ा ले आए। लकडू राम हंस पड़े।

संदेश:-
वापसी में तीनों चुप थे। तब कवि राम लखन बोले - "वहशी भाई, घर में नाराजगी, रास्ते में परेशानी... फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं। क्यों?"

वहशी राम मुस्कुराए और बोले -  
"भाई, कवि का घर ईंट-पत्थर से नहीं, शब्दों से बनता है। पत्नी माया मांगती है, दुनिया मोहब्बत। मैं दोनों के बीच फंसा एक पुल हूँ। अगर आज मैंने चाय-नाश्ते में कमी की, तो कल अपनी कविता से सौ गुना मीठा पिला दूंगा। अगर आज टायर पंचर हुआ, तो कल अपने शब्दों से हजारों का दिल जोड़ दूंगा।"

"रोटी कम हो तो बाँटकर खा लो। पर सम्मान कम मत होने दो। मेहमान भगवान होता है। और कवि का धर्म है - पहले सुने, फिर सहे, फिर कहे।"

उस दिन गाड़ी तो देर से पहुंची, पर तीनों के मन में एक बात पक्की हो गई -  
"आयोजन सफल वही है जहाँ भूख मिटे या न मिटे, पर रिश्ते जरूर बच जाएं।"

समाप्त
कथा का संदेश :
1. गृहस्थ और साहित्य का संतुलन - माया भी जरूरी, मोहब्बत भी जरूरी।
2. अतिथि देवो भव - कमी हो तो भी इज्जत से विदा करो। 
3. सेवा में बड़प्पन - टायर बदलना और शब्द गढ़ना, दोनों में पसीना एक जैसा लगता है।


"कवि का घर"    
"कवि का घर ईंट-पत्थर से नहीं, शब्दों से बनता है"

क्यों "कवि का घर" बेहतर है:
1. व्यापक है - इसमें चटाई-बेड, चाय-रोटी, टायर-पंचर सब समा जाता है। 
2. संदेश साफ है - घर का मतलब सिर्फ रसोई नहीं, मेहमाननवाजी और सम्मान भी है।
3. स्मरणीय है - सुनते ही पाठक के मन में सवाल उठता है "आखिर कवि का घर कैसा होता है?"

यह घटना अब एक दस्तावेज बन गई । आने वाली पीढ़ी पढ़ेगी तो समझेगी कि 15 अगस्त से पहले "वंदे भारत कवि सम्मेलन" सिर्फ मंच पर नहीं, दिलदारनगर के एक घर की चटाई पर भी लड़ा गया था।

- कवि सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत!



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