*गीत: "माता-पिता"*
20 पंक्ति, गीत-छंद, अप्रकाशित रचना
ईश्वर से पहले जो नाम जपा जाता है,
माता-पिता का वो रूप धरा पर आता है।
माँ की ममता का कोई मोल नहीं होता,
बाबा के कंधों-सा कोई स्कूल नहीं होता।
रातों को जागे माँ, दिन भर पापा लड़े,
हमारी खातिर दोनों ने सपने अपने जड़े।
पहली उंगली पकड़ चलना माँ ने सिखाया,
गिरकर उठना, फिर लड़ना पिता ने बताया।
रोटी खुद आधी खाकर हमें पेट भर खिलाते,
फटे जूते पहनकर भी हमें नए दिलाते।
माँ की लोरी में सारा जहाँ सो जाता,
पिता की डाँट में छुपा प्यार नज़र आता।
बचपन में जब बुखार हमें छू जाता,
माँ की गोद और बाबा की दुआ काम आता।
बड़े हुए तो शिकवे करने लग जाते हैं,
भूल जाते हैं कंधे किसने दिए थे।
बूढ़ी आँखों में जब आँसू भर आते हैं,
अपने ही घर में वो पराए हो जाते हैं।
मत करना कभी अनदेखा उन हाथों को,
जिन हाथों ने तुम्हें थामकर बड़ा किया।
माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है,
चारों धाम उनके चरणों में ही बसे हैं।
जीते जी कर ले सेवा, यही धर्म है,
वरना श्मशान में पछतावा ही कर्म है।
माता-पिता का ऋण कभी चुकाया नहीं जाता,
बस शीश झुकाकर ये गीत गाया जाता है॥
- सुखमंगल सिंह,
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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