Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

"माँ की अंतिम इच्छा"

 
"माँ की अंतिम इच्छा"

गाँव का नाम था करमपुर, जिला बक्सर, बिहार।  
सन 1968 का समय था। चारों तरफ अकाल पड़ा था। अनाज के लिए लोग पत्ते उबाल कर खा रहे थे।  
इसी भीषण समय में "दुखिया माँ" ने एक बेटे को जन्म दिया। नाम रखा "विपत्ति"।

दुखिया ने 9 महीने गर्भ में पाला, फिर 5 साल तक भूख-प्यास सहकर उसे बड़ा किया।  
जब विपत्ति 10 साल का हुआ तो दुखिया ने घर की भैंस बेची, खेत गिरवी रखे, और दूध बेच-बेचकर बेटे को पढ़ाया।  
"मेरा बेटा अफसर बनेगा" - यही एक सपना था।

सपना पूरा हुआ। विपत्ति पुलिस में दरोगा बन गया। वर्दी, रुतबा, इज्जत सब मिली।  
पर इज्जत के साथ घमंड भी आ गया।

"विपत्ति के पिता":
 एक संत स्वभाव के किसान थे। 5 साल पहले वो ईश्वर की शरण में चले गए।  
घर में अब सिर्फ दुखिया माँ बची। सरकार से जो 1000 रुपये वृद्धा पेंशन आती थी, वो भी बेटा विपत्ति ले लेता।  
"माँ, तुम्हें क्या करना है पैसों का" कहकर चुप करा देता।

एक दिन दुखिया बीमार पड़ी। विपत्ति ने कहा "माँ तुम मेरी बहन " राधिका" के पास रहो"।  
राधिका ने कुछ दिन रखा, फिर अपनी मजबूरी बताकर भाई से कहा।  
विपत्ति दूसरी बहन "शोभना" के घर छोड़ आया। शोभना का पति " हरिया"  था। उनकी 2 बेटियाँ थीं - "पूजा और किरण" ।  
और शोभना का एक बेटा भी था "अमन" ।

शोभना के घर में ही माँ दुखिया ने आखिरी साँस ली।  
मरने से पहले माँ ने दामाद हरिया और पोते अमन का हाथ पकड़कर कहा:  
"बेटा, अगर मैं काशी में मर जाऊँ तो मेरी लाश मेरे उस बेटे विपत्ति को मत देना।  
जिसने जीते जी मुझे दुख दिया, वो मेरे मरने पर भी मुझे शांति न दे पाएगा।"

पर कानून और वर्दी बड़ी होती है।  
खबर मिलते ही दरोगा विपत्ति काशी पहुँचा। शोभना से लड़-झगड़कर माँ की लाश ले गया।  
रात के 2 बजे पांडेपुर, काशी से चलकर 100 किलोमीटर दूर अपने गाँव बक्सर ले गया।  
वही बेटा जो जीते जी माँ को "बोझ" कहता था, आज "माँ का अंतिम संस्कार" के नाम पर भीड़ जुटा रहा था।

गाँव वाले सब जानते थे। कोई बोला - "देखो, जीते जी सताया, मरने पर दिखावा कर रहा है"।  
विपत्ति ने घाट पर खड़े होकर कहा "मैं माँ का सपूत हूँ"।  
पीछे से किसी बूढ़ी ने कहा - "सपूत वही जो माँ को रोटी दे, पेंशन न छीने"।

*संदेश*

इस कहानी का नाम " विपत्ति"  इसलिए था, क्योंकि वो माँ के लिए विपत्ति बन गया।  
पर समाज में ऐसी कई "शोभना" भी हैं जो बिना खून के रिश्ते को भी माँ मानकर सेवा करती हैं।  
और कई "पूजा-किरण"  जैसी बेटियाँ हैं जो कहती हैं - "नानी, हम तुम्हारा ख्याल रखेंगे"।

सीख:
1. "जीते जी सम्मान करो"  - मृत्यु के बाद का दिखावा पाप है।
2. "बेटा-बेटी में फर्क मत करो"  - जो सेवा करे वही असली वारिस है।  
3. "वृद्धा पेंशन माँ का अधिकार है" , बेटे की जेब का खर्च नहीं।

माँ दुखिया चली गई, पर उसकी आखिरी सीख गाँव में आज भी गूंजती है:  
"बेटा नाम का विपत्ति न बने, और बेटी नाम की शोभना हर घर में हो"।
ये कथा उन सभी बेटों के लिए सबक है जो माँ-बाप को बोझ समझते हैं।

- डॉ.सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक ,वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 


Sukhmangal Singh

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ