"ममता का निर्जला व्रत"
भूखी है, प्यासी है, पर चेहरे पर तेज है,
क्योंकि आज उसने निर्जला व्रत रखा है।
न कोई अन्न का दाना, न पानी की एक बूंद,
पर आँखों में ममता का सागर भरा है।
सुबह से रसोई में लगी है,
सबके लिए फलाहार बना रही है,
पति के लिए, बच्चों के लिए,
पर खुद के लिए - बस एक लोटा गंगाजल और तुलसी का पत्ता।
डॉक्टर ने कहा था - तुम्हें शुगर है, व्रत मत रखो,
उसने हँसकर टाल दिया,
बोली - माँ का व्रत डॉक्टर नहीं, भगवान समझते हैं।
ये कैसा व्रत है,
जहाँ खुद जलकर दूसरों को शीतलता देनी है,
जहाँ खुद भूखा रहकर दूसरों का पेट भरना है।
उसका निर्जला व्रत किसी पति की लंबी उम्र के लिए नहीं,
किसी करवा चौथ की कथा के लिए नहीं,
उसका व्रत है - मेरे बच्चे को नौकरी लग जाए,
मेरी बेटी ससुराल में खुश रहे,
मेरे घर में कोई बीमार न हो।
शाम को जब पूजा की थाली सजाती है,
तो थाली में दिया नहीं, उसकी ममता जलती है।
जब कहानी सुनती है, तो होंठ कुछ और कहते हैं,
दिल कुछ और मांगता है -
हे भगवान, सबका भला करना, पहले मेरे बच्चों का।
रात को जब सब सो जाते हैं,
तब वो चुपके से पानी का घूंट पीती है,
और ऊपर देखकर कहती है - माफ करना भगवान,
ममता के आगे व्रत टूट गया।
भगवान भी मुस्कुराते हैं,
कहते हैं - यही तो सबसे बड़ा व्रत है,
ममता का निर्जला व्रत,
जहाँ भूख देह की नहीं, आत्मा की होती है।।
-डॉ .सुखमंगल सिंह /वाराणसी
Sukhmangal Singh
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