*मैं पर्वत हूँ*
मैं पर्वत हूँ। युगों से खड़ा हूँ, मौन, अडिग, धैर्य की प्रतिमूर्ति बनकर। लोग मुझे पत्थर का ढेर समझते हैं, पर मेरे भीतर एक धड़कता हुआ संसार बसता है। मेरी क्रियाएँ, मेरी खुशियाँ, मेरे गम और मेरे कार्यक्रम, सब ऋतुओं की तरह आते-जाते रहते हैं। मैं अपनी जगह पर युगों से खड़ा हूं ।
*मेरी क्रियाएँ*
मैं हर पल निज कर्म में लीन हूँ। मेरी पहली क्रिया है थामना। मैं बादलों को थामता हूँ तो धरती पर वर्षा होती है। मैं नदियों का उद्गम थामता हूँ तो खेतों में हरियाली उतरती है। मेरी गोद में देवदार, चीड़, बुरांश के जंगल पलते हैं। मैं उन्हें थामता हूँ ताकि भूस्खलन की बेला में वे गाँव को बचा लें।
मेरी दूसरी क्रिया है सहना। तपती दोपहरी सहता हूँ, कड़कड़ाती सर्दी सहता हूँ, बिजली की मार सहता हूँ। मेरे वक्ष पर हिमपात होता है तो मैं चुपचाप सफेद चादर ओढ़ लेता हूँ। जब वसंत आता है तो उसी बर्फ को पिघलाकर नदी बना देता हूँ। सहना ही मेरा धर्म है, क्योंकि मेरे सहने से ही घाटी में जीवन पनपता है। लोक कुशल जीवन जीते हैं।
मेरी तीसरी क्रिया है देना। मैं झरने देता हूँ, जड़ी-बूटी देता हूँ, शुद्ध हवा देता हूँ। मेरे पत्थर से ही घर की नींव पड़ती है, मेरे सीने को चीरकर ही सड़कें बनती हैं। ऋषियों को मैंने अपनी कंदराएँ दीं, सैनिकों को मैंने अपनी ऊंचाई दी है।
*मेरी खुशी*
मुझे खुशी तब होती है जब भोर की पहली किरण मेरे शिखर को सोने से मढ़ देती है। जब कोई थका-मांदा यात्री मेरी छांव में सुस्ताकर कहता है, “वाह, कितना सुकून है”। जब सावन में बच्चे मेरे झरनों के नीचे नहाकर खिलखिलाते हैं। जब कोई प्रेमी-युगल मेरी चोटी पर खड़े होकर दूर तक फैली घाटी को देखता है और उसकी आंखें भर आती हैं।
सबसे बड़ी खुशी तब मिलती है जब कोई पर्वतारोही महीनों की साधना के बाद मेरे शिखर पर तिरंगा फहराता है। उस क्षण उसका गर्व मेरा गर्व बन जाता है। जब गाँव का स्कूल मेरी , लकड़ी से बनता है और उसमें बच्चों की किलकारी गूंजती है, तब लगता है मेरा होना सार्थक हुआ।
*मेरा गम*
पर मैं पत्थर हूँ तो क्या, दर्द मुझे भी होता है। जब स्वार्थ के लिए मेरे जंगलों को काट दिया जाता है, तो हर कुल्हाड़ी मेरी आत्मा पर चलती है। जब डायनामाइट से मेरा सीना चीरकर सुरंगें बनाई जाती हैं, तो मैं रात भर कराहता रहता हूँ।
सबसे अधिक दुख तब होता है जब बादल फटता है और मेरे ही पानी से नीचे बसे गाँव बह जाते हैं। लोग मुझे दोष देते हैं, पर कोई नहीं पूछता कि मेरे जंगल कहाँ गए जिन्होंने पानी को रोकना था। जब प्लास्टिक की बोतलें और कचरा मेरे झरनों को गंदा कर देते हैं, तो मेरा मन मैला हो जाता है। अकेलेपन की रातों में जब बर्फीली हवा सन्नाटे को चीरती है, तब मैं उन पुरखों को याद करता हूँ जो मुझे देवता कहते थे।
वर्तमान समय में मुझे एक पत्थर समझकर ही लोग रह जाते हैं।
*मेरे कार्यक्रम*
मेरा जीवन भी उत्सवों से भरा है। ग्रीष्म में मेरा पहला कार्यक्रम है ‘मेला’। बुरांश के लाल फूलों के बीच गाँव वाले ढोल- नगाड़े के साथ नाचते हैं। वर्षा में मेरा कार्यक्रम है ‘हरियाली’। मैं पूरी घाटी को हरा कंबल ओढ़ा देता हूँ, झरने गीत गाते हैं।
शरद में मेरा सबसे बड़ा कार्यक्रम है ‘हिम-उत्सव’। मैं सफेद पोशाक पहन लेता हूँ और देश-विदेश के सैलानी घूमने सैर करने आते हैं। मेरे आंगन में नंदा देवी राजजात यात्रा निकलती है तो बारह साल में एक बार मैं दूल्हे-सा सजता हूँ। कार्तिक में जब दीपावली आती है, तो नीचे घाटी के दिए टिमटिमाते हैं और मैं ऊपर से उस जगमगाहट को देखकर निहाल हो जाता हूँ।
मैं पर्वत हूँ। न मुझे जीत का घमंड है, न हार का भय। मैं बस खड़ा हूँ, ताकि तुम गिरो तो संभल सको। मेरी ऊंचाई तुम्हें यह सिखाने के लिए है कि लक्ष्य बड़े हों तो रास्ते कठिन होंगे ही। आओ, मुझे काटो मत, समझो। क्योंकि जिस दिन मैं दरक गया, उस दिन तुम्हारी सांसें भी दरक जाएंगी।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी
Sukhmangal Singh
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