"मैं साइकिल रखना, उसे संभाल पर"*
बरसात का मौसम था। रामू के पास बस एक पुरानी साइकिल थी — टूटी घंटी, जंग लगी चेन, पर वही उसकी जान थी।
पिताजी ने सुबह ही कहा था, "बेटा, खेत पर खाद का बोरा पहुँचा देना। देर हुई तो फसल खराब हो जाएगी।" रामू ने सिर हिलाया। बोला, "मैं साइकिल रखना, उसे संभाल पर।" मतलब साफ था — साइकिल भले खटारा हो, पर जिम्मेदारी मेरी है। मैं इसे भी संभाल लूँगा और काम भी।
रास्ता कीचड़ से भरा था। आधे रास्ते में साइकिल की चेन उतर गई। बोरा भारी था, पैर फिसल रहे थे। दो बार गिरते-गिरते बचा। पीछे से गाँव के हरिया काका हँसे, "अबे छोड़ दे, कल बैलगाड़ी से भिजवा देंगे।"
रामू रुका। साइकिल को देखा। फिर बोला, "नहीं काका। बापू ने कहा है आज, तो आज ही जाएगा। मैं साइकिल रखना, उसे संभाल पर।"
उसने हाथ काले किए, चेन चढ़ाई, बोरे को फिर से कैरियर पर बाँधा और पैदल ही साइकिल घसीटता खेत तक पहुँचा। कपड़े मिट्टी में सने थे, पर आँखों में जिद की चमक थी।
शाम को पिताजी खेत से लौटे। बोरे को देख कर बस इतना बोले, "तूने संभाल ली।"
रामू मुस्कुराया। साइकिल की टूटी घंटी बजाई — ट्रिन... ट्रिन। आवाज़ कमजोर थी, पर भरोसा पक्का था।
कभी-कभी चीज़ें पुरानी होती हैं, रास्ते मुश्किल होते हैं। पर जब कोई कह दे "मैं साइकिल रखना, उसे संभाल पर", तो समझ लो काम हो जाएगा।
कैसी लगी कहानी? इसमें कोई मोड़ जोड़ना चाहो?
- सुख मंगल सिंह
Sukhmangal Singh
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