मैं भाव में बहता हूँ
मैं छंद में नहीं बंधता,
मैं भावों में बहता हूँ।
न मात्राओं का हिसाब रखता हूँ,
न तुकबंदी का जाल बुनता हूँ,
बस जो दिल में उठता है,
उसे कागज पर रखता हूँ।
मेरी कविता
किसी व्याकरण की मोहताज नहीं,
यह तो मेरे गाँव की माटी है,
मेरे खेत की बयार है,
मेरी माँ की लोरी है।
मैं लिखता हूँ तो
भारत जागता है,
मैं लिखता हूँ तो
एक सैनिक सरहद पर मुस्कुराता है।
कविता ही जीवन है,
और जीवन ही कविता है,
इसी सृजन से समाज तक
मेरा प्रण जाता है।।
-सुख मंगल सिंह
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