*मैं ग्रीष्म ऋतु हूं*
मैं ग्रीष्म ऋतु हूं। मैं तब आती हूं जब धरती प्यास से तड़पती है। मेरी पहली दस्तक आम के बौर पर होती है। मैं देखती हूं कैसे बच्चे मेरी तपिश से बचने को नानी के आंचल में दुबक जाते हैं, पर अगले ही पल कुल्फी वाले की घंटी सुनकर नंगे पांव भाग निकलते हैं।
मेरे आने की खबर सबसे पहले पीपल को लगती है। उसकी पत्तियां मुझसे बतियाने को बेताब होकर खड़खड़ाने लगती हैं। दोपहर में जब मैं अपना आंचल पूरी तरह फैला देती हूं, तो सड़कें सूनी हो जाती हैं। केवल एक पागल सा लू का झोंका गलियों में चक्कर काटता है। मैं क्रूर नहीं हूं। मैं तो बस धरती को तपाती हूं ताकि वह भीतर तक खुल जाए।
मुझे याद है वह छोटा सा गांव जहां रोहिणी रहती थी। दस साल की रोहिणी, जिसके पिता खेतों में काम करते थे। उसके घर मिट्टी का घड़ा था। हर सुबह वह उसमें खूंटी से बंधी नई मटकी का पानी भरती। दोपहर में जब मैं अपने चरम पर होती, मजदूर उसी घड़े के पास आकर रुकते। रोहिणी बिना बोले हर एक को लोटा भर पानी देती। पानी इतना ठंडा कि पीने वाले की आंखें बंद हो जातीं। एक दिन हैजे से उसका बाबा गुजर गया। उस दिन मैंने खुद को समेट लिया। शाम को बादलों को बुलाकर झुका दिया। पहली बूंद रोहिणी के माथे पर गिरी थी। वह चौंकी नहीं। उसने बस हथेली फैला दी, जैसे कह रही हो कि ले जाओ मेरा दुख।
शहरों में मेरा रूप अलग है। वहां मैं कांच की इमारतों से टकराकर और भड़क उठती हूं। एसी की ठंडी हवा में बैठे लोग मुझे कोसते हैं। पर मैं देखती हूं फुटपाथ पर रेहड़ी वाले को। वह तरबूज काटता है। लाल रंग देखकर मेरी छाती ठंडी हो जाती है। एक टुकड़ा वह धूप में खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले को दे देता है। पुलिस वाला हेलमेट उतारता है। उसके बाल पसीने से भीगे हैं। वह मुस्कुराता है। उस एक मुस्कान के लिए मैं सौ गालियां सह लेती हूं।
मुझसे सबसे ज्यादा प्रेम और घृणा एक साथ करते हैं किसान। वे मुझे देखते ही अपना माथा पकड़ लेते हैं क्योंकि मैं उनके हलक सुखा देती हूं। फिर भी वे ही मेरी प्रतीक्षा करते हैं। क्योंकि मैं ही वह हूं जो उनकी फसल को पकाती हूं। गेहूं की बालियों में दूध भरता है तो मेरी ही वजह से। आम में मिठास मैं ही घोलती हूं। मैं निर्दयी होती तो क्या फालसे को काला करती? क्या जामुन को रस से भरती?
मेरे दिन लम्बे होते हैं पर मेरी शामें सबसे मोहक। सूरज ढलते ही मैं अपना गुस्सा भूल जाती हूं। तब मैं मोगरे की कलियों को खिलने का हुक्म देती हूं। आंगन में पानी छिड़कने की सोंधी गंध उठती है। बच्चे फिर बाहर निकल आते हैं। औरतें छतों पर चारपाई डालती हैं। कहानियों का दौर चलता है। मैं चुपचाप उनके बीच से गुजरती हूं। किसी के पांव सहलाती हूं, किसी की खुली जुल्फों से खेलती हूं।
मुझे जाना भी उतना ही जरूरी है जितना आना। जब सावन की पहली पुरवाई चलती है, मैं समझ जाती हूं कि मेरा समय पूरा हुआ। मैं धीरे धीरे अपना बोरिया बिस्तर समेटने लगती हूं। जाते मैं कुओं को थोड़ा ऊपर तक भर देती हूं। नदियों को बता देती हूं कि अब घबराने की जरूरत नहीं।
लोग कहते हैं मैं कठोर हूं। हां, शायद हूं। पर मैं वह शिक्षिका भी हूं जो सिखाती है कि छाया का मूल्य क्या होता है। मैं बताती हूं कि एक घूंट पानी का मतलब क्या होता है। मैं याद दिलाती हूं कि मेल-मिलाप की खटिया कब बिछानी चाहिए।
अगले साल फिर आऊंगी। फिर आम पकाऊंगी। फिर किसी रोहिणी के घड़े का पानी मीठा करूंगी। क्योंकि मैं ग्रीष्म हूं। मैं तपती हूं ताकि तुम जीना सीखो।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी अंबेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश
Sukhmangal Singh
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