Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मैं प्रवासी

 
मैं प्रवासी, मेरे दिल में भारत धड़कता है
मेरी रगों में गंगा की धारा बहती है।

मैं दूर देश में हूँ, पर दिल भारत में है
मेरी आँखों में हिमालय की ऊंचाई है।

मैं प्रवासी, मेरे दिल में भारत बसता है
मेरी ज़ुबान पर संस्कृत की धुन है।

मैं दूर देश में हूँ, पर दिल की यादें भारत में हैं
मेरी आँखों में भारत की गंगा की लावणी है।

मैं प्रवासी, मेरे दिल में भारत की मिट्टी है
मेरी नसों में भारत की संस्कृति है।

मैं दूर देश में हूँ, पर दिल की आवाज़ भारत में है
मेरी आँखों में भारत की जय है।

मैं प्रवासी, मेरे दिल में भारत की गंगा है
मेरी ज़ुबान पर भारत की वंदना है।

मैं दूर देश में हूँ, पर दिल की यादें भारत में हैं
मेरी आँखों में भारत की माँ की आशीष है।

मैं प्रवासी, मेरे दिल में भारत की शान है
मेरी ज़ुबान पर भारत की पहचान है।

मैं दूर देश में हूँ, पर दिल भारत में है
मेरी आँखों में भारत की उम्मीद है।।

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
वाराणसी 
Sukhmangal Singh





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