Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

''महिमा संजीवनी मंत्र की - गीत"

 
''महिमा संजीवनी मंत्र की - गीत"

संजीवनी मंत्र की महिमा, गूढ़ बड़ी भारी है, 
मुरदा में भी प्राण फूंक दे, बात यही न्यारी है । 

जब लक्ष्मण को शक्ति लगी, राम भी रोए धीर खोए, 
हनुमत दौड़े पर्वत लाए, वैद्य सुसेण तब बोए। 

बूटी नहीं ये मंत्र है, जो शिव ने गाया था, 
शुक्राचार्य ने जप की इसको, मृत को जिलाया था। 

ॐ हौं जूं सः मंत्र है, मृत्यु को जो टारे, 
जप ले जो सच्चे मन से, संकट उसके सारे टारे। 

डॉक्टर जब हार मान ले, दवा काम न आए, 
संजीवनी तब काम करे, यम भी लौट जाए। 

काशी के घाटों पर ये, मंत्र ध्वनि  गूँज रही, 
मंगल की वीणा पर ये धुन, आज भी सज रही। 

नेपाल में मुरारी बचा, तुमने लीला दिखाई, 
हरिद्वार में पाँच यात्री, तुम्हरी महिमा गाई। 

संजीवनी केवल बूटी नहीं, भाव की धारा है, 
जो पिए इस भाव को, उसका बेड़ा पार है। 

रोग मिटे, शोक मिटे, मिटे सभी संताप, 
संजीवनी जपने वाले के, कटें तीनों ताप। 

घर-घर में दीप जलेगा, जब ये मंत्र जपेगा, 
भारत माता हँसेगी, जब भारत ये गाएगा। 

अवधूत आश्रम में बैठे, हमने यही जाना, 
जीवन और मृत्यु दोनों, तेरा ही अफसाना। 

तू ही मंत्र, तू ही तंत्र, तू ही औषधि सारी, 
तू ही वैद्य, तू ही रोगी, तू ही कृष्ण मुरारी। 

संजीवनी मंत्र नहीं, जीवन की परिभाषा है, 
मृत्यु के उस पार भी, यही तो केवल आशा है।। 

- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अम्बेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश




 2 Attachments  •  Scanned by Gmail



Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ